श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६२ ☆ देश-परदेश – विंबलडन की विंडम्बना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

लॉन टेनिस खेल की सबसे पुरानी प्रतियोगिता प्रतिवर्ष लंदन शहर में बरसो से आयोजित होती आ रही है। प्रतिवर्ष जून के अंतिम सप्ताह से आरंभ होकर जुलाई के मध्य तक चलने वाली प्रतियोगिता जब लंदन में आयोजित होती है, तो वहां का मौसम भी खुशनुमा रहता है।

हमारे देश में इस समय गर्मी चरम पर रहती है। देश के अधिकतर अमीरजादे, क्रिकेटर और बॉलीवुड के बिगड़ैल गर्मी से निजात पाने के लिए विंबलडन खेल देखने के बहाने लंदन शहर चले जाते हैं। इनके पास दौलत इतनी अधिक है, कि खर्च नहीं हो पाती है।

बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध लेखक/ गीतकार जो शरीर के दर्द दूर करने की दवा का टीवी पर विज्ञापन भी करते है, विंबलडन देखने गए हुए हैं। उनकी वर्तमान पत्नी और पूर्व पत्नी का पुत्र भी अपनी वर्तमान पत्नी के साथ लंदन गया हुआ है। मीडिया में छाए रहने के लिए हवाई यात्रा कंपनी की तारीफ में भी कशीदे पढ़ दिए, कि इनके वायुयान में बैठने के लिए बहुत खुला स्थान उपलब्ध है, ये नहीं बताया कि वो “बिजनेस क्लास” से यात्रा कर रहें हैं।

इस खेल को देखने अधिकतर वो व्यक्ति जाते हैं, जो घर में एक ग्लास पानी का स्वयं उठाकर नहीं पीते हैं। रईसों की दुनिया में विंबलडन प्रतियोगिता देखना अब एक “स्टेटस” की श्रेणी में आता है। एक लड़के के विवाह बायो डाटा में भी लिखा हुआ था, कि लड़का तीन बार विंबलडन देखने जा चुका है। ऐसे लड़के जीवन में घर के कभी फ्यूज बल्ब तक नहीं बदले होंगे।

विंबलडन प्रतियोगिता में बॉल उठाने के लिए युवा लड़के और लड़कियां सेवा में रहती हैं, ताकि खिलाड़ी खेल पर अधिक ध्यान दे सकें। खिलाड़ियों के जैसे ये युवा भी बहुत फुर्तीले और फिट रहते हैं।

गोल्फ, लॉन टेनिस, क्रिकेट जैसे अंग्रेजों के खेल में सहायक की आवश्यकता होती है। अंग्रेजों ने तो पूरी दुनिया पर लंबे समय तक राज़ कर गुलामों से ऐसे कार्य करवाते थे। अब तो अंग्रेज़ अपने देश तक ही सीमित हो चुके हैं, लेकिन गुलामों/नौकर रखने की आदतें अभी भी हैं। सही कहा गया है” bad habits die hard”.

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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