श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३८ ☆
☆ आलेख – मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र में कुलपति बनने का गौरव प्राप्त करने वाले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। आपका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में कोलकाता विश्वविद्यालय के संस्थापक उप कुलपति आशुतोष मुखर्जी के घर पर हुआ था। आप का बचपन से ही मेघावी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विचारक, गहन चिंतन और शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रहा है।
आप की शिक्षा-
यही कारण है कि आप ने 1917 में मैट्रिक, 1921 में बीए, 1923 में वकालत की उपाधि बहुत ही बेहतरीन अंको से प्राप्त की थी। आप ने हरेक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। आपको गणित के अध्ययन में विशेष रूचि थीं । इस कारण आप 22 वर्ष की उम्र में एमए करने के बाद विदेश चले गए। आप की प्रतिभा से प्रभावित हो कर लंदन की मैथमेटिक्स सोसाइटी ने आपको मानद सदस्यता सम्मानित किया गया था। यह किसी भारतीय व्यक्ति के लिए बहुत ही गौरव की बात थीं।
वैवाहिक जीवन-
लंदन से आप से 1926 में वकील बनकर भारत आ गए। इसी वर्ष आपका विवाह सुधा देवी से हो गया। मगर आपका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद आपने आजीवन शादी न करते हुए मानवता की सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया।
शिक्षा जगत में ख्याति-
जब आपकी उम्र 23 वर्ष की थी तभी आप पिता का देहांत हो गया था। उसी समय आपको कोलकाता विवि विद्यालय की प्रबंध समिति में ले लिया गया। यही से आपके कार्यों की वजह से बहुमुखी प्रतिभा सभी के सामने प्रकट होने लगी। आपके प्रखर विचार, शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व विद्वत्ता को देखते हुए आप को 33 वर्ष की अल्पायु में कोलकाता विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया।
भारतीय शिक्षा इतिहास में आपको सबसे कम उम्र के कुलपति बनने का श्रेय आप को प्राप्त हुआ है।
आप का जीवन लक्ष्य-
आपने छात्र जीवन से अपने मूल लक्ष्य तय कर लिए थे। आप आध्यात्मिक तथा विज्ञान से युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। अध्यात्मवाद, सहनशीलता, मानवता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक विचारों की एकता के विचारों पर आजीवन दृढ़ता से चलते रहें। यही वजह है कि अपनी पत्नी के निधन के बाद आपने अपना पूरा जीवन मानवता, उसके विकास और वैज्ञानिक गतिशीलता के लिए समर्पित कर दिया था।
परिवार का जीवन पर प्रभाव–
आपके जीवन पर अपने परिवार के सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राजनीति जीवन का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। आप का लालन-पालन जिस परिवार में हुआ था वहां आशुतोष मुखर्जी जैसे सुलझे विचारों के धनी पिता, शिक्षामित्र, विद्वान तथा ओजस्वी वक्ता की छत्रछाया आप को प्राप्त हुई थीं। साथ ही घर में होने वाले विभिन्न आयोजनों, गोष्ठियां, विचार-विमर्श, चिन्तन-मनन, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिकों वातावरण का आप के जीवन पर सकारात्मक व दृढ़ प्रभाव पड़ा। यही वजह है कि आपके मन में भारत की पुरातन संस्कृति के प्रति विशेष प्रेम, विज्ञान के प्रति लगाव, मानवता के प्रति विशेष अनुराग पैदा हुआ।
आपकी अनुकरणीय प्रतिभा–
आप की प्रतिभा को इसी बात से समझा जा सकता है कि आपने जितनी भी परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं उन सभी में आप प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 8 अगस्त 1934 से 7 अगस्त 1938 रहते हुए अनेक विश्वविद्यालय के सम्मेलनों का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और नए विचार दिए। इस कारण आपकी गिनती उस समय के भारत के शीर्षस्थ शिक्षाविदों में होने लगी थी।
आपके उल्लेखनीय कार्य–
तत्कालीन समय में भारतीय जनता की स्थिति बहुत दयनीय थीं। भारतवासी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक दृष्टि से बेहतर स्थिति में नहीं थे। अंग्रेज कूटनीति द्वारा भारत का विभाजन की चाल चल रहे थे। इस कारण आप ने भारत की जनता के उत्थान और उसके सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। ताकि आप अपनी संपूर्ण ऊर्जा से मानवता की सेवा कर सके।
सन 1939 में राजनीति में प्रवेश करने के साथ आपने अपनी कार्यशैली में आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया। इस कारण आपने गांधीजी की अहिंसा वादी नीति का घोर विरोध किया। आप कहते थे कि गांधीजी की अहिंसावादी नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी वैचारिक मतभेद के कारण आप कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों के और विरोधी हो गए थे।
अकाल में आप की मानवतावादी सेवा–
इसी दौरान 1943 में भारत के बंगाल प्रांत में भयंकर अकाल पड़ गया। चूंकि आप मानवता के प्रखर और प्रबल समर्थक थे, इस कारण आपने बंगाल में आए इस संकट के लिए बड़े पैमाने पर सहायता व राहत कार्य किया। इसके लिए राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवियों, धर्मगुरुओं आदि की सहायता से जरूरतमंदों और पीड़ितों की भरपूर सहायता पहुंचाने के लिए बंगाल राहत समिति का गठन किया। जिसे बाद में हिंदू महासभा राहत समिति नाम दिया गया था।
लोगों ने इसमें बड़ी-बड़ी और छोटी-छोटी नगद राशियों से अकाल पीड़ित जनता की भरपूर सहायता कीं। इससे लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सका। आप के इस मानवतावादी कार्य से राष्ट्रीय एकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक व धार्मिक एकता का परिचय के साथ-साथ वहां की जनता को राष्ट्रीय एकता व एकजुट्ता की प्रेरणा प्राप्त हुईं।
आप के प्रभावाकारी विचार–
आप सांस्कृतिक एकता के प्रबल समर्थक थे। आपका मानना था कि सभी व्यक्ति सांस्कृतिक रूप में एक ही है। इनका धार्मिक रूप से विभाजन करना गलत है। आप इस नीति के घोर विरोधी थे। आप कहते थे कि हम सब में एक ही रक्त, एक ही भाषा, एक ही संस्कृति रची बसी है, इसलिए आपको प्रति सभी धर्मों के लोगों की आप पर संपूर्ण आस्था थीं। आपको हरेक धर्म, संस्कृति व सम्प्रदाय के लोगों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त था।
आप का राजनीतिक जीवन और उल्लेखनीय कार्य-
आपके विचारों की वजह से आपको बंगाल प्रांत का वित्त मंत्री बनाया गया था। जहां आप ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एमके फजलूल हक के समय 12 दिसंबर 1941 से 20 नवंबर 1942 तक वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके पूर्व भी आप बंगाल विधान परिषद में सांसद की हैसियत से 1927 से 1947 तक काम करते रहे हैं।
आप 15 अगस्त 1947 को भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 6 अप्रैल 1950 तक आप इसी पद पर बने रहे। 1947 को आप को स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था।
यह मंत्रालय सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने से दिया गया। क्योंकि वे उस समय गांधीजी व कांग्रेसियों की नीति के विरोधी थे। इस दौरान आप ने चितरंजन में रेलवे इंजन का कारखाना, विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना और बिहार में खाद बनाने के कारखाना खोला। ताकि यहां की जनता की दयनीय व करुणाजनक स्थिति में सुधार हो सके।
आप का प्रबल विरोध–
इसी दौरान आपने विभिन्न प्रांतों की यात्राएं कीं। आप भारतीय जनता की शोचनीय दशा से चिंतित थे। कश्मीर में अलग वजीर-ए-आलम यानी प्रधानमंत्री, अलग झंडा और उस को विशेष दर्जा दे रखा था। आप आरंभ से ही एक भारत, एक झंडे और एक प्रधानमंत्री के प्रबल समर्थक थे। इस पर आपके और सरकार के बीच मतभेद हो गए। आप 370 धारा खत्म करने की प्रबल समर्थक थे। जबकि सरकार इसे बनाए रखना चाहती थी।
इस मतभेद के कारण आपको मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। कारण, आप कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय चाहते थें। इसलिए आपने प्रजातंत्र पार्टी बनाकर कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेई (तत्कालीन विदेश मंत्री), वैद्य गुरुदत्त बर्मन, टेकचंद आदि के साथ में 6 मई 1953 को जम्मू के के लिए कूच किया। चूंकि बिना अनुज्ञा के आपने कश्मीर में प्रवेश किया था इस कारण आपको जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
मानवता के इस पुजारी की 40 दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई। भारतीय जनसंघ पार्टी के संस्थापक व्यक्तित्व का इस तरह चला जाना भारत की जनता के लिए अपूरणीय क्षति थीं। मगर आप अपने पीछे अपने कार्यों से ऐतिहासिक यादगार छोड़कर चले गए जो हमें सदैव आपका स्मरण कराती रहेगी।
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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
06-06-2022
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