श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७६ ☆ जहाँ गिरते पत्ते रचते हैं: नया बसंत… ☆
वह घर किसी बंद गली में नहीं था। लोग आते-जाते रहते थे, आवाज़ें भी थीं, हलचल भी। फिर भी वह घर अपने आप में बहुत पुराना और ठहरा हुआ-सा था—जैसे समय ने उसे धीरे-धीरे संभालकर रखा हो। उसके आँगन में एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था। कोई ठीक से नहीं जानता था कि वह कितना पुराना है—बस इतना तय था कि घर बनने से बहुत पहले भी वह वहीं था, और हम सबकी कई पीढ़ियों से पहले के लोग भी उसे वैसे ही देखते आए थे।
वह पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं था—वह परिवार का ही एक सदस्य था। उसकी छाँव में बैठना, उसके नीचे लेटना, उसके पत्तों को गिरते देखना—सब कुछ जीवन का हिस्सा था। जब वह बहुत घना हो जाता, तो उसे थोड़ा कटवा दिया जाता। कटी हुई टहनियाँ दो-तीन दिन आँगन में पड़ी रहतीं, और उन्हीं के बीच हम बच्चे छोटे-छोटे घर बनाकर खेलते। आज भी वह दृश्य कहीं भीतर ज्यों का त्यों रखा है।
हर साल ऋतुएँ आती-जाती रहीं। तब हमें बस इतना पता था कि कभी नीम के पत्ते झरते हैं, और कुछ समय बाद वह फिर से हरा-भरा हो जाता है। बसंत आता, तो उसकी डालियाँ नई कोपलों से भर जातीं। और जब पत्ते गिरते, तो आँगन जैसे धीरे-धीरे एक सुनहरी चादर ओढ़ लेता—जैसे पेड़ अपनी थकान उतार रहा हो।
उस घर में एक स्त्री रहती थी, जिसने जीवन में बहुत कुछ खोया था—कुछ सपने, कुछ भरोसे, और कुछ अपने लोग भी। जब-जब पत्ते झरते, उसे लगता जैसे उसका अपना ही जीवन कहीं झर रहा हो। वह रोज़ आँगन बुहारती, गिरे पत्तों को हटाती—मानो अपने दुःख के निशान मिटा रही हो।
एक दिन उसने ध्यान दिया—जहाँ पत्ते सबसे ज़्यादा गिरे थे, वहीं की मिट्टी कुछ अलग ही नरम और ज़िंदा-सी लग रही थी। कुछ हफ्तों बाद, उसी जगह छोटी-छोटी हरी कोंपलें फूट आईं। वह ठिठक गई। जिन पत्तों को वह अब तक बोझ समझकर हटाती रही थी, वही तो इस नई हरियाली की खाद बन गए थे।
उस दिन उसे समझ आया—कुछ चीज़ें जीवन से गिरती नहीं हैं, वे हमें आगे के लिए तैयार करती हैं।
जो टूटता है, वही भीतर कहीं कुछ नया रचता है।
जो छूटता है, वही आने वाले समय के लिए जगह बनाता है।
अगले बसंत में वह नीम का पेड़ पहले से ज़्यादा हरा था। और वह स्त्री? वह भी। उसके भीतर कोई चमत्कार नहीं हुआ था—बस एक गहरी शांति जन्म ले चुकी थी। यह जानकर कि हर पतझड़ हार नहीं होता, और हर गिरता पत्ता किसी नए बसंत की भूमिका लिख रहा होता है।
अब वह आँगन रोज़ बुहारती नहीं थी।
वह गिरे पत्तों को देख मुस्कुरा देती थी—
और आज, जहाँ कहीं भी उसे नीम का पेड़ दिख जाता है,
उसके भीतर वही पुराना सुकून उतर आता है।
क्योंकि उसे पता है—
यहीं कहीं, यहीं से,
एक नया बसंत रचा जा रहा है।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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