श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – सोने को पंख लग गए ☆ श्री राकेश कुमार ☆
सोने के भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़ते आ रहे हैं। इस प्रकार की चर्चा सुनते सुनते कई दशक बीत गए। बचपन से आरंभ सफर से बुढ़ापे की दहलीज तक पहुंचते सोने के लिए ये ही सब सुनते आ रहे हैं।
विगत कुछ समय से लोग कह रहे है, सोने के तो अब पंख लग गए हैं। पंख लगे पक्षियों के लिए ऊंचाई मायने नहीं रखती हैं। असमान से भी ऊपर पहुंचने की दम रखते हैं।
तिजोरियों में बंद सुरक्षित सोना भी क्या सोचता होगा, कि वो तो सौ तालों में बंद रहता है, दुनिया झूठी है, और कहती है, कि सोने के तो अब पंख लग गए हैं।
राजस्थान के छोटे से कस्बे डेगाना जिला नागौर में एक सुनार की दुकान से एक कबूतर ने सोने की एक चेन लेकर उड़ान भर ली थी। फिर क्या था ? पूरे कस्बे के लोग कबूतरों के पीछे पीछे दौड़ने लग गए, क्या पता कौन सा कबूतर उड़ा कर ले गया हो। जब कोई व्यक्ति कीमती वस्तु को उठा कर भागता है, तो भी तो सब उसके पीछे भागने लग जाते हैं।
कस्बे के बुजुर्ग कहने लगे, किसी ने कबूतरों को ट्रेनिंग करवा कर ये काम करवाया होगा। इतिहास में भी ये जानकारी है, कि राजकुमारियों के प्रेम पत्र का आदान प्रदान कबूतर ही करते थे।
हमारे समय में तो गली मोहल्ले के आशिकों को भी कबूतर का दर्जा मिला हुआ था। वो तो पंजाबी के प्रसिद्ध गायक दलेर मेहंदी ने “कबूतरबाजी” में गैर कानूनी कमाई करी तब से कबूतर शब्द से ही लोग गुरेज करने लग गए हैं।
डेगाना कस्बे के भोले भाले कबूतर ने सोने की चेन उसके मालिक को जल्दी लौटा कर, पक्षियों की ईमानदारी प्रमाणित कर दी है।
© श्री राकेश कुमार
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