श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७८ ☆ फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास… ☆
फाल्गुन का शुक्ल पक्ष जैसे ही आरंभ होता है, प्रकृति के स्वभाव में एक सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता—यह धीमा, संयत और मधुर होता है। जैसे कोई कलाकार रंग भरने से पहले कैनवास पर हल्की रेखाएँ उकेर रहा हो।
हवा में एक नई पारदर्शिता है। धूप में कोमलता घुल गई है। वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुरों की हरियाली केवल मौसम का संकेत नहीं, बल्कि जीवन की पुनरावृत्ति का संदेश है। सरसों के खेतों का पीत आभास, आम्र-मंजरियों की गंध, और दूर कहीं कोयल की प्रथम तान—ये सब मिलकर एक ऐसी भूमिका रचते हैं, जिसे हम “फागुनी आहट” कह सकते हैं।
यह वह समय है जब रंग अभी खुले नहीं हैं, पर उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। जैसे मन के भीतर कोई सुप्त ऊर्जा जाग रही हो।
और इसी जागरण को शब्द मिलते हैं—
खुशियाँ अपार लायी,
हौले-हौले मुस्कायी।
झूम के गुलाल संग,
देखो हमजोली आयी।।
*
तोड़ सारे बंधनों को,
बोलती उदासी देखो।
कलियाँ सजी हैं सारी,
रंग बिखराती देखो।।
फागुन केवल ऋतु नहीं, एक मनःस्थिति है। यह हमें याद दिलाता है कि ठहराव स्थायी नहीं होता। जमी हुई ठंडक के बाद ऊष्मा अवश्य आती है। रिश्तों में आई दूरी पिघल सकती है। संवाद फिर से आरंभ हो सकते हैं।
आज का युवा वर्ग, जो गति और प्रतिस्पर्धा के बीच जी रहा है, उसके लिए भी फागुन एक संदेश है—रुककर अपने भीतर के रंगों को पहचानो। जीवन केवल लक्ष्य नहीं, उत्सव भी है।
और शायद इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए—
भावनाओं के तो बाँध
टूट-टूट बहते हैं।
जाने-अनजाने सारे
भेद सदा कहते हैं।।
*
लाल, नीले, पीले, हरे—
करते कमाल रंग।
फाग और फगुआ का
साथी ये धमाल रंग।।
फागुनी आहट हमें सिखाती है कि परिवर्तन शोर से नहीं, संकेत से आता है। उत्सव अचानक नहीं उतरते, वे भीतर तैयार होते हैं।
अभी रंगों का उत्सव दूर है, पर यह प्रारंभिक स्पर्श ही सबसे कोमल और सच्चा होता है। यही वह क्षण है जहाँ प्रकृति और मन एक साथ मुस्कुराते हैं।
फागुन की यह धीमी दस्तक हमें आमंत्रित करती है—
अपने भीतर के धुंधले कोनों में भी थोड़ा उजास भरने के लिए।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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