श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६८ ☆ देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆
चाय की चाहत तो हर समय रहती हैं। मोबाइल के आ जाने से चाहत कुछ कम तो हो गई है, परन्तु चाय अभी भी सबसे पसंदीदा पेय हैं।
चाय के भी अनेक नाम, रंग रूप और स्वाद होते हैं। प्रातः काल खटिया पर पी जाने वाली चाय अंग्रेज हमें “बेड टी” के नाम से छोड़ गए हैं। दूसरा चाय का कप “हैंगओवर ब्रेक टी” के नाम रहता हैं। ब्रेकफास्ट टी के बिना ब्रेकफास्ट अधूरा कहलाता हैं।
11 बजे ऑफिस की पहली चाय के बाद ही सरकारी दफ्तरों में कार्य करने के लिए मानस बनाना आरंभ होता हैं। दोपहर के भोजन पश्चात “नींद भगाओ चाय” के बाद ही सरकारी कर्मचारी अपना आसन ग्रहण करते है। सांय के चार बजे के लिए अंग्रेज़ “इवनिंग टी” का ज्ञान दे कर चले गए थे।
सांय छः बजे पत्नी के हाथ से बनी हुई घर की चाय के साथ हल्का नाश्ता आपकी रात्रि भोजन की मात्रा को कम करने का राम बाण फार्मूला हैं।
चाय के बहुत सारे रंग तो हम सब जानते ही हैं, जिनमें लाल, काली, सफेद चाय यानी शुद्ध दूध में थोड़ी सी पत्ती को उबाल कर पिया जाता हैं। विगत कुछ वर्षों से “हरी चाय” भी हम सब के घरों में अपने पैर जमा चुकी हैं।
कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने पूछा नीली चाय पियोगे क्या ? वज़न कम हो जाता हैं। उसके भाव सुनकर ही हमारी जेब का वजन अवश्य कम हो गया हैं। मित्र ने हंसते हुए बोला कोई बात नहीं तुमको “ठंडी चाय” ही पिलाते हैं। आप गलत दिशा में विचार करने लगें है। मित्र ने बिना दूध की चाय को ठंडा कर उसमें बर्फ के कुछ टुकड़े डाल कर “आइस टी” परोस कर इतिश्री कर ली।
© श्री राकेश कुमार
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