श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “फागुन की चिट्ठी…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८० ☆ फागुन की चिट्ठी… ☆
मेरे प्रकृति-मित्रों,
मैं फागुन हूँ। हर साल चुपचाप तुम्हारे आँगन में उतर आता हूँ—कभी हल्की हवा बनकर, कभी फूलों की खुशबू बनकर, कभी किसी पेड़ की नई कोपल में छिपकर। जब तुम Holi के रंगों में भीगते हो, तब मुझे सबसे ज़्यादा आनंद होता है।
रंग उड़ते हैं, हँसी गूँजती है, और मन जैसे थोड़ी देर के लिए फिर से बच्चा हो जाता है।
पर इस बार मैं तुमसे एक छोटी-सी विनती करना चाहता हूँ।
जब तुम अपने प्रियजनों को गुलाल लगाओ, तो एक चुटकी गुलाल अपने आँगन के किसी पौधे के नाम भी रख देना। उस तुलसी के पास, उस छोटे से नीम या अमरूद के पेड़ के पास, या उस बेल के पास जो चुपचाप तुम्हारी दीवार थामे खड़ी है।
हल्के से उसके तने को छूकर कहना—
“तुम भी हमारे उत्सव के साथी हो।”
क्योंकि पौधे केवल हरियाली नहीं होते।
वे हमारी साँसों की शांति हैं,
हमारी थकान की छाया हैं,
और हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।
हमारी परंपराओं में उन्हें कभी देवता माना गया, कभी पूर्वजों का रूप। शायद इसलिए कि वे बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे, हमें जीवन देते रहते हैं।
अगर इस होली तुम एक चुटकी गुलाल पौधों को भी लगा दोगे, तो यह केवल एक प्रतीक नहीं होगा—यह प्रकृति से दोस्ती का एक छोटा-सा वचन होगा।
और तब शायद तुम्हें महसूस होगा कि हवा भी थोड़ी और मधुर हो गई है,
पत्ते भी हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे हैं,
और तुम्हारे आँगन में खड़ा हर पेड़ मन ही मन कह रहा है—
“अब सच में फागुन आया है।”
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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