श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०९ ☆
आलेख – साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन वर्तमान समय में किसी दुर्गम हिमालयी चढ़ाई से कम नहीं है क्योंकि यह केवल मुद्रण का व्यवसाय नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुष्ठान है। आज के इस तीव्र गति वाले डिजिटल युग में जहाँ सूचनाएं पलक झपकते ही स्मृति से ओझल हो जाती हैं वहाँ एक गंभीर साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन करना अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अगाध प्रेम का ही परिणाम हो सकता है।
कितनी ही साहित्यिक पत्रिकाएं बड़े उत्साह से प्रारंभ की जाती हैं, किन्तु पाठकीय समर्थन ना मिलने से या आर्थिक समस्याओं के चलते, विज्ञापन नहीं मिल पाने से अनेक उतनी ही जल्दी बंद भी हो जाती हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष सबसे पहली और बुनियादी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की ही है क्योंकि व्यावसायिक पत्रिकाओं की तरह इनके पास विज्ञापनों का बड़ा आधार नहीं होता और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अर्थ प्रबंधन या सुधि पाठकों के सहयोग पर टिकी होती है। जबलपुर से विश्व वाणी हिंदी संस्थान के बैनर तले दिव्य नर्मदा और मंडला से महिष्मति जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन के दौरान मैंने इन धरातलीय संघर्षों को करीब से जिया है जहाँ बढ़ती मुद्रण लागत और डाक व्यय की चुनौतियों के चलते कई बार उत्कृष्ट प्रयासों को भी विराम देना पड़ता है।
कागज की बढ़ती कीमतों और वितरण की जटिलताओं ने लघु पत्रिकाओं के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, हम देख रहे हैं कि इसी कारण कई ऐतिहासिक प्रिंट पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं। हालांकि संकट के इसी दौर ने तकनीक के माध्यम से एक नया मार्ग भी प्रशस्त किया है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारा ई-अभिव्यक्ति पोर्टल है। वेब पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित करते हुए इस मंच ने सात लाख अड़सठ हजार से अधिक हिट्स प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सामग्री स्तरीय हो, नियमित प्रकाशन किया जाए तो पाठक भौगोलिक सीमाओं को लांघकर जुड़ता है।
त्वरित संपादन और वैश्विक पहुंच के कारण यह पोर्टल पारंपरिक साहित्यिक पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक का एक प्रभावी संगम बनकर उभरा है जहाँ पंद्रह अक्टूबर दो हजार अठारह से हमारी टीम निरंतर साहित्यिक अलख जगा रही है।
प्रिंट मीडिया के अपने गौरव और डिजिटल की अपनी गति के बीच समन्वय साधना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
एक बड़ी चुनौती नई प्रतिभाओं के चयन और परिष्कार की भी है क्योंकि आज रचनाओं की बाढ़ तो है लेकिन गुणवत्ता का अकाल पड़ता जा रहा है। ऐसे में संपादक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह आत्ममुग्धता के इस दौर में श्रेष्ठ और कालजयी साहित्य को पहचानकर उसे स्थान दे। वैचारिक और संवैधानिक चुनौतियों के बीच निष्पक्षता बनाए रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा के बीच एक महीन संतुलन साधना पड़ता है।
ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से फ्लिप बुक बनाना, जैसे नवाचारों ने यह दिखाया है कि कैसे दीपावली विशेषांकों की परंपरा को आधुनिक बदलते प्रकाशन चोले में जीवित रखा जा सकता है, और बढ़ते डाक व्यय से निपटकर एक क्लिक में उसे दुनिया में कही भी पहुंचाया जा सकता है।
आब ओ हवा पोर्टल पर मैं नियमित स्तंभ लिख रहा हूं, मेरा अनुभव यही है कि अब युवाओं में प्रकाशित साहित्य की जगह, पॉडकास्ट, ई बुक, किंडल बुक्स आदि अधिक लोकप्रिय है।
अंततः साहित्यिक प्रकाशन केवल पन्नों का संकलन नहीं बल्कि एक जीवंत संवाद है जो अतीत की विरासत को भविष्य के सपनों से जोड़ता है। यदि समाज और सरकारें इन वैचारिक केंद्रों को संरक्षण नहीं प्रदान करेंगी तो आने वाले समय में हमारी बौद्धिक चेतना का धरातल संकुचित हो जाएगा। चुनौतियों के इस महासागर के बीच जो पत्रिकाएं और वेब पोर्टल निरंतर सक्रिय हैं वे वास्तव में शब्द की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ने वाले प्रहरियों की तरह हैं जिनकी तपस्या ही साहित्य को सजीव बनाए रखे हुए है। प्रिंट के संघर्षों से लेकर वेब पत्रकारिता के इस नए आकाश तक की यात्रा यही सिखाती है कि माध्यम चाहे जो भी हो निष्ठा और गुणवत्ता ही अंततः पाठक के हृदय में स्थान बनाती है। दिव्य तूलिका इसी संघर्ष की आग में तप कर, मुरैना जैसे एक छोटे शहर से, अवस्थी जी के व्यक्तिगत प्रयासों से निखर रही है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं सदैव पत्रिका के साथ हैं।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
लंदन प्रवास पर
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





