श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३३ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
ग्वारीघाट से तिलवारा घाट:13 अक्टूबर 2018
ग्वारीघाट से चले दो घंटे हो चुके थे। तिलवारा घाट शाम तक पहुँचने का लक्ष्य था। तिलवारा घाट का पुल तीन किलोमीटर पहले से दिखने लगा था। उसे देखते ही लगा कि लो पहुँच गए तिलवारा घाट, परंतु चलते-चलते पुल नज़दीक ही नहीं आ रहा था। पुल के दृश्य का पेनोरमा नज़ारा जैसा का तैसा बना था। तभी सामने एक बड़ा चौड़ा पहाड़ी नाला रास्ता रोककर खड़ा हो गया। खेतों में काम कर रहे मल्लाहों से पूछा तो उन्होंने बताया कि दो किलोमीटर ऊपर चढ़कर नाला पार करके नागपुर रोड पर पहुँच कर तिलवारा घाट पहुँचा जा सकता है इसका मतलब हुआ चार किलोमीटर का चक्कर। सबके पसीने छूट गए।
टी.पी.चौधरी साहब सपत्नीक गेंदों की मालाओं, नारियल,फल और ढेर सारा प्यार व परकम्मावासियों के प्रति हृदय में सम्मान लेकर तिलवारा घाट पर खड़े हमारी स्थिति लेते रहे थे। मोबाइल से उनको निवेदन किया कि एक नाव घाट से भिजवा दें। इसके पहले कि वे घाट पर आएँ एक नाविक को हम दिख गए और हमने भी तेज़ आवाज़ के साथ हाथ हिलाए। वह आया तो उसकी नाव में बैठकर तिलवारा घाट पर उतरे। चौधरी साहब ने बड़ी आत्मीयता और सम्मान से माला पहनाकर स्वागत किया और नारियल चिरोंजी अर्पित किया मानो हम देव हो गए हों। हमेशा की तरह हम उनके चरणस्पर्श करने को झुके तो उन्होंने हमें रोक दिया क्योंकि हम परिक्रमा वासी थे। भाभी जी अभिभूत थीं, उनका मातृवत प्रेम पूरी यात्रा हमारे साथ चला। सब लोग चौधरी दम्पत्ति के बारे में बतियाते रहे।
वैराग्य पर बातें करने लगे। घर, कपड़े, बिस्तर, पानी, खाना, पंखा, फ़र्निचर, गद्दे, गाड़ी, रुपया-पैसे, रिश्ते-नाते इन सब से परे भगवान भरोसे सिर्फ़ भगवान भरोसे। न रास्ते का पता, न खाने का पता, न ठिकाने का पता। बस एक अवलंबन नर्मदा, जिसके भरोसे ईश्वर के रिश्ते की डोर आदमियत से बंधी है। बस वही बचाएगी, वही खिलाएगी, वही सुलाएगी। सब कुछ तोड़कर और सब कुछ छोड़कर उसकी धारा में जाओगे तो वह पार लगाएगी। कर्मकांड से परे एक दीपक आस्था का। जूझो धूप से, पहाड़ से, पानी से, इंसानी नादानी से। धौंकनी सा चलता दिल, पिघल कर पसीना होती देह और आत्मा में तारनहार के प्रति असीम आस्था की परीक्षा है नर्मदा यात्रा।
जिस घर के सामने पहुँचकर कंठ से “नर्मदे हर” का अलख जगाया। उत्तर में हर-हर नर्मदे का स्वर घर के सभी सदस्यों की आवाज़ में एकसाथ गूंजा और सबसे बुज़ुर्ग सदस्य की आवाज़ सुनाई देती है बैठो साहब पानी पी लो, चाय पी लो, भोजन बना दें। सिर्फ़ आदमियत का रिश्ता कि पूरी पृथ्वी के जीव एक ही ब्रह्म के अंश, सब अन्योनाश्रित हैं। वसुधेव कुटुम्बकम, भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा मूल्य, जो मानवता वादियों का सबसे बड़ा संबल है। धर्म का सच्चा रूप और दुनिया की आतंकवाद के विरुद्ध एकमात्र आशा।
अत्यावश्यक से परे न्यूनतम पर निर्वाह पर विचार हुआ। भूख, भोजन, यौनइच्छा और आराम ये चार चीज़ें मानुष और पशु को प्रकृति की अनिवार्य देन हैं क्योंकि जीवन का चक्र इन्हीं से गतिमान होता है। भूख है तो भोजन की तलाश है, शरीर की थकान से भरपेट भोजन मिला तो यौन इच्छा जागती है, जिसकी पूर्ति होते ही नींद की प्रगाढ़तावश आराम अनिवार्य हो जाता है। छः दिन भूख, भोजन, यौनइच्छा से परे सुबह से शाम तक चलते-चलते चूर होने से भूख मिट गई, भोजन नहीं मिला तो यौनइच्छा लुप्त सी रही क्योंकि काम की जननी ऊर्जा का अंश देह में बचा ही नहीं। यहाँ से प्रथम सह यात्री विनोद प्रजापति दमोह को वापिस चले गये, श्रीवर्धन नेमा व रवि भाटिया जबलपुर।
तिलवारा घाट से भेड़ाघाट: 14 अक्टूबर 2018
14 तारीख़ को हम तिलवारा घाट से चलने को तैयार हुए तो पता चला कि पुल के किनारे से एक नाला गारद और कंपे से भरा होने के कारण रास्ता दलदली हो गया है लिहाज़ा एक किलोमीटर ऊपर से नए घूँसोर, लमहेंटा, चरगवा, धरती कछार से एक रोड शाहपुरा निकल गई है, वह राह पकड़ी। लम्हेंटा घाट पर शनि मंदिर से लगा ब्रह्म कुंड देखा। ऐसी मान्यता है कि जब कोई कोढ़ी मर जाता है तो उसके शव को ब्रह्मकुंड में सिरा देते हैं। वह सीधा पाताल लोक पहुँच जाता है।
उसके बाद आया बगरई गाँव। बगरई शिल्पकारों का गाँव है। वहाँ कारीगरों के 250-300 घर हैं। चारों तरफ़ संगमरमर पत्थर की खदानें हैं। दस हज़ार रुपयों में एक ट्राली पत्थर ख़रीद कर कटर, छेनी, वसूली और दांतेदार रगड़ से पत्थर को मूर्तियों की शक्ल में ढाल देते हैं। अधिकांश कारीगरों ने बैंकों से क़र्ज़ लिए थे वे सब ख़राब हो गए, उनका रिकार्ड बिगड़ने से उनको क़र्ज़ मिलना बंद हो गया। अब निजी माइक्रो फ़ाइनैन्स कम्पनी के कारिंदे उन्हें 24% वार्षिक ब्याज की दर से क़र्ज़ उनके घर पर देते हैं और घर से ही वसूली करते हैं। बगरई गाँव में एक बसोड के घर रुक कर पानी पिया। अरुण दनायक जी ने उनसे लम्बी बातचीत की, उनके फ़ोटो उतारे। आगे रामघाट की तरफ़ चल दिए। तब पता नहीं था कि हमें बिजना घाट तक का सफ़र तय करना होगा। रामघाट पर ढीमर जाल में मछली पकड़ते मिले।
नर्मदा का सच्चा सेवक “निषाद समाज” है। केवट, निषाद, धीवर, ढीमर, मल्लाह, मछुआरे, कहार, बरुआ, बरौआ, बर्मन इन उपनाम वाले मेहनती लोग देश की अधिकांश नदियों की मचलती लहरों पर सवार होकर लोगों को पार उतारने वाली जातियों के रूप में पहचाने जाते हैं। आदमी की तरह शब्द भी पैदा होते हैं, बड़े होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। इन शब्दों की जीवन यात्रा का एक विकास क्रम है। शब्द सरोकार से पैदा होते हैं, अपनी उपयोगिता सिद्ध करके संस्कृति के हिस्से बनकर चले जाते हैं। भारत में जातियाँ खेत या बगीचों की तरह व्यवस्थित रूप से उगाई फ़सल की तरह विकसित नहीं हुईं हैं। जातियाँ जंगल में विकसित पेड़-पौधों, घास-फूस, झाड़ी-झंखाड़ की तरह ज़रूरत के अनुसार उपजी और विकसित हुईं हैं। बर्मन कहलाने वाले ये लोग नर्मदा घाटी के मूल निवासी हैं। नर्मदा घाटी में बाहर से आए लोगों ने व्यापार वाणिज्य और प्रशासन के मेल मुलाक़ात से एक तंत्र विकसित करके वाणिज्यिक गतिविधियों पर अधिकार कर लिया। ये बेचारे लघु सीमांत कृषक, मछली पालन और नाविक बनकर जहाँ के तहाँ हैं।
जबलपुर के ग्वारीघाट पर नर्मदा किनारे पहुँचते ही नाव से उस पार जाने के लिए काले स्याह बर्मन युवकों से सामना होता है। ये अर्धनग्न मेहनतकश नौजवान उछलते-कूदते नाव को घुमाते रहते हैं। उनकी बाहों, पुट्ठों, पीठ और पैर पर धूप में चमकती मांसपेशी मछलिएँ उनके श्रमसाध्य जीवन की कहानी स्वमेव कह जाती हैं। यह समाज अमरकण्टक से भड़ौच तक नर्मदा के दोनों किनारों पर सेवा को मुस्तैद रहता है। ये लोग नर्मदा की सभी सहायक नदियों के किनारे भी जीवन के अनिवार्य हिस्से हैं।
तिलवारा घाट से परिक्रमा शुरू करने के बाद जब ख़ूब प्यास लगी तो पहला घर जिस पर दस्तक दी, वह बर्मन का था। छरछरे बदन की एक महिला ने नर्मदे हर कहने पर रुकने का इशारा किया, उनके घर रुक गए। उन्होंने पहले ठंडा पानी फिर गरम चाय से परिक्रमावासियों को निहाल कर दिया। भोजन की ज़ुहार करने लगीं जिसे हमने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनका परिवार नर्मदा के कछार की ज़मीन पर तरबूज़-ख़रबूज़ सागभाजी उगाता था। तीन साल पहले जबलपुर के खटीकों ने गुंडई से ज़मीन हड़प ली। वहाँ फ़ार्महाउस बन रहा है। मालूम पड़ा कि ज़मीन सरकारी थी जिसे वे लोग सैकड़ों साल से जोत रहे थे। अब कोर्ट में केस लगा है जिसकी सुनवाई पर बर्मन परिवार ने जाना बंद कर दिया है। ज़ाहिर है कि फ़ार्महाउस की फ़सली ज़मीन पर रंगीनी रातों का सिलसिला शुरू होगा। बर्मन परिवार बेदख़ल कर दिया जाएगा।
सुविधा के लिहाज़ से हम इनका सम्बोधन निषाद समाज से करेंगे। जब से नदियों के किनारे मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है तब से निषाद समाज का अस्तित्व रहा है। नाव बनाना, जाल बुनना, नदी पार कराना, नाव खेना, मछली पकड़ना, नदी कछार में खेती करना और डूबतों को तारना इत्यादि इनकी आजीविका के साधन रहे हैं।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





