श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८८ ☆
☆ अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
अधिक मास भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का सुंदर समन्वय है। यह हमें स्मरण कराता है कि संसार को बदलने की अपेक्षा यदि हम स्वयं को बदलना प्रारंभ करें, तो हमारी दृष्टि बदलती है और उसी के साथ हमारी सृष्टि भी बदलने लगती है।
हम प्रायः जीवन में परिस्थितियों, लोगों अथवा भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है। जब हम अपने विचारों, आदतों और कार्यशैली में सुधार लाते हैं, तब उसके सकारात्मक परिणाम हमारे संबंधों, कार्यों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं।
अधिक मास हमें थोड़ी देर रुककर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है—क्या मैं कल से आज बेहतर हूँ? क्या मेरे व्यवहार, धैर्य, संवेदनशीलता और कर्म में गुणवत्ता बढ़ी है? यदि प्रतिदिन केवल एक छोटा-सा सुधार भी हो, तो समय के साथ वही परिवर्तन जीवन को नई दिशा दे सकता है।
जैसे माली पौधे की जड़ों को सींचता है और फिर हरियाली स्वयं प्रकट होती है, वैसे ही आत्मविकास के बीज बोने पर सफलता, संतोष और प्रसन्नता स्वतः फलित होते हैं। अधिक मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर के दीप को प्रज्वलित किया जाए।
जब स्वयं में परिवर्तन आता है, तब वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ भी नई प्रतीत होने लगती हैं। यही अधिक मास की साधना है और यही उसके आध्यात्मिक महत्व का सार।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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