श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८१ ☆ देश-परदेश – गधे पंजीरी खाए ☆ श्री राकेश कुमार ☆
वर्षों से ये कहावत सुनते आ रहे थे। आज घर के पास वाले उद्यान में नगर निगम द्वारा कुत्तों पर जल से छिड़काव करते हुए देखा, तो गधे पंजीरी खाए वाली कहावत याद आ गई।
इतनी भीषण गर्मी में यदि कुत्तों पर पानी से वर्षा की गई है, तो उसमें कुछ बुराई भी नहीं है। हमारे उद्यान के फुरसतिया साथियों ने तो नगर निगम के बुराईयों के पिटारे खोल दिए। घरों में पानी की सप्लाई बहुत कम है, और यहां कुत्ते पानी में अठखेलियां कर रहे हैं।
एक साथी ने तो झुग्गी झोपड़ी वालों के लिए वकालत कर दी। जितने मुंह उतनी बातें, कोई कहने लगा ये सब उच्चतम न्यायालय के कारण हो रहा है, उन्होंने कुत्तों को कुछ अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इंसानों को छोड़ जानवरों पर न्यायायलय दया दिखा रहा है।
एक बैंकर मित्र बोले हमारा पेंशन का मामला वर्षों से न्यायालय के विचाराधीन है, उस पर उच्चतम न्यायालय ने आंखें मूंद रखी है, और यहां कुत्तों, कबूतरों पर नित नए निर्णय आ रहे हैं।
हम उद्यान के सभी साथियों ने नगर निगम के जल वाहन चालक को घेर लिया, और उसको पूछा इन कुत्तों पर क्यों पानी व्यर्थ कर रहे हो उसने स्पष्ट किया वो तो उद्यान की घास पर जल छिड़काव कर रहा हैं, कुत्ते तो बिन बुलाए बाराती हैं, और बारात में नृत्य कर आनंद ले रहे हैं। आप बुजर्ग लोग क्यों परेशान हो रहे हो, उद्यान का आनंद लो, ओर प्रभु का नाम भजो।
बात, तो उस वाहन चालक की एकदम सही है। हम बुजर्ग हमेशा खामखां ही परेशान रहते हैं।
© श्री राकेश कुमार
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