श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९० ☆
☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भारतीय संस्कृति में पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और पुण्य संचय का विशेष अवसर माना गया है। यह अतिरिक्त मास चंद्र और सौर गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है तथा भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण “पुरुषोत्तम मास” कहलाता है। धर्मग्रंथों में इस माह को जप, तप, दान, सत्संग और सेवा के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।
भारतीय परंपरा में धर्म केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की रक्षा को भी पुण्यकर्म माना गया है। पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित इस सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी आध्यात्मिक साधना का ही एक रूप है। इसलिए पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि के साथ-साथ प्रकृति-संरक्षण का भी संदेश देता है।
इस पावन अवधि में वृक्षारोपण, पौधों की सेवा, पक्षियों के लिए जल-पात्र रखना, जलस्रोतों की स्वच्छता, नदी-तालाबों के संरक्षण का संकल्प लेना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना भी श्रेष्ठ सेवा मानी जा सकती है। जब हम एक पौधे को रोपते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं, तब वह केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं होता, बल्कि सृष्टि के प्रति हमारी श्रद्धा का भी परिचायक बनता है।
आज जब प्रकृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पुरुषोत्तम मास हमें यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की आराधना और प्रकृति की सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्ची भक्ति वही है जो मानव, जीव-जंतु और प्रकृति—सभी के कल्याण का भाव अपने भीतर समेटे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही पुरुषोत्तम मास की वास्तविक सार्थकता भी।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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