श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

ब्रह्मकुण्ड से साँकल 09 नवम्बर 2019

पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के पहले देवताओं ने ब्रह्मकुंड पर तपस्या की थी दैवीय  शक्तियों से दुर्गा देवी का प्रकट आविर्भाव हुआ था। दस किलोमीटर आगे भैंसा नामक गाँव है उसी के पास मुआर घाट पर देवी-भैंसासुर संग्राम हुआ था जहाँ देवी ने भैंसासुर का वध में किया था। ब्रह्मकुण्ड में देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा का वास रहा था।

ब्रह्मकुण्ड से चले एक घंटा हुआ था कि विंध्य पर्वत की भांडेर पर्वत श्रेणी के कगार से उत्तरी तट पर हीरापुर के नज़दीक हिरन नदी खरखराती आकर नर्मदा में समा गई। हिरन नदी जबलपुर जिले के कुंडम के निकट से निकलती है, दमोह जिले के तेंदुखेड़ा और सागर जिले के नौरादेही से कई नाले और बेलकुंड, सोहर और कैंर को समेटते परिअत नदी उसमें आ मिलती है। हिरन नदी जबलपुर जिले और नरसिंहपुर जिले की सीमा निर्धारित करती है।

सुबह आठ बजे साँकल के लिए रवाना हुए एक दिन पहले की थकाऊ यात्रा के बाद थोड़ा आराम से चलने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे चलना शुरू किया पहले बरगी से आती नहर के किनारे चलने लगे लेकिन एक राहगीर के सुझाव पर नर्मदा के तट पर उतर गए। रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ सने खेतों से था, सामने से चमकते सूर्य की बढ़ती गर्मी मुश्किल बढ़ा रहीं थीं, शरीर पसीने से तरबतर माँसपेशियाँ लस्तपस्त हो चुकीं थीं, ऐसे में साँकल सराय जाने के लिए एक किलोमीटर की तंग पहाड़ी सामने आ गई। पाँच मिनट हाँफती साँस को थामा फिर चढ़ने लगे और आधा घंटे की चढ़ाई के बाद एक मकान पर धर्मशाला लिखा दिखा वहाँ पहुँचे तो पता चला कि रामप्रसाद साहू ने परकम्मा वासियों के लिए धर्मशाला बनाई है। एक कमरा खोला उसमें आमने सामने दो दरवाज़े थे और चारों कोनों में गेहूँ के बोरों की छल्ली लगी थी। अस्सी वर्षीय रामप्रसाद साहू से मुलाक़ात हुई उनके पोते-पोतियाँ आ गए। उन्होंने स्वागत करके भोजन इत्यादि के लिए आश्वस्त करके पोती को बुलाकर उनकी माँ को भोजन की व्यवस्था करने को कहा। थोड़ी देर बाद जनानख़ाना से ख़बर आई कि “मम्मी कल ग्यारस उपासी थीं, आज शनीचर उपासी हैं उनने कही है कि वे थकीं हैं न बना पाएँगी।” रामप्रसाद आँखों में पानी भरकर बोले बाबा हम परवश हैं आप सीधो लेकर बना लो। क़रीब दो घंटे बाद एक गोल लौंकी परांत में हँसिए के साथ डोलती आई, हमें हाथ आजमाते देख दादा की बहु पल्लू में मुस्कुराते हुए  बोली, रहन दो बाबा हम बनाए दे रहे। चार बजे तीस रोटियों के साथ सब्ज़ी बनकर आ गईं। हरेक ने चार-चार रोटियाँ लौकी साग के साथ साफ़ कीं और दो-दो रोटियाँ बचाकर रखीं जिन्हें रात को आठ बजे दूध-गुड़ से खाईं। इस प्रकार लंच-डिनर दोनों सध गए, एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।

रात में रामप्रसाद साहू बोले “लोधी घमंडी हैं धर्मशाला के सामने हैंडपम्प नहीं लगने दे रहे,  अपने खेतों के बीच में पड़ने वाली ज़मीन को किसी भी तरह धौंस धपट से ख़रीद कर एक चक बना लेते हैं। नरसिंहपुर जिले की अस्सी प्रतिशत ज़मीन उनके स्वामित्व में है।” लोधियों का थोड़ा परिचय लेते चलें। लोधी (लोधाया लोध) भारत में पायी जाने वाली एक किसान जाति है। ये मध्यप्रदेश में बहुतायत में पाये जाते हैं, मुस्लिम आक्रमण और प्रताड़ना से तंग आकर पहले विस्थापित होकर पश्चिमोत्तर सीमा से उत्तर भारत, फिर नर्मदा घाटी में आ बसे है। नरसिंहपुर जिले में लोधी हैं परंतु होशंगाबाद जिले में वे नदारत हैं, वहाँ रघुवंशी, गूज़र अधिक हैं। लोधी ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ की एक जाति है, परंतु इस जाति के लोग राजपूतो से संबधित होने का दावा करते हुए ‘लोधी-राजपूत’ कहलाना पसंद करते हैं। जबकि, इनके राजपूत मूल से उद्धृत होने का कोई साक्ष्य नहीं है और न ही इन लोगो में राजपूत परंपराए प्रचलित है। हमने आठ-दस किसानों से पूछा राजपूतों की उत्पत्ति सूर्य से, जैसे राम का इक्ष्वाकु वंश सूर्यकुल से उत्पन्न हुई या कृष्ण का यादव वंश चंद्रकुल से आया है,  उनकी सिलसिलेवार वंशावली मिलती है। लोधियों की उत्पत्ति सूर्य या चंद्र, किससे हुई है। उन्होंने बताया कि लोधी ठाकुर हैं, बस इतना जानते हैं। असल में, वे पिछड़ा वर्ग का लाभ लेते हैं इसलिए खुलकर नहीं बोलते। ब्रिटिश शासन के एक प्रशासक, रोबर्ट वेन रुसेल ने लोधी शब्द के कई संभव शाब्दिक अर्थों का जिक्र किया है, उदहरणार्थ लोध वृक्ष के पत्तों से रंगो का निर्माण करने का कार्य करने के कारण ये लोग लोधी कहलाए। रुसेल ने यह भी कहा है कि ‘लोधा’ मूल शब्द है जो कि बाद में मध्य प्रदेश में ‘लोधी’ में रूपांतरित हो गया। एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, लोधी अपने निवास अफ़ग़ानिस्तान से पंजाब के लुधियाना में आकर बसे फिर मुस्लिम आक्रमणों से परेशान होकर गंगा-यमुना के दोआब गए वहाँ वे लुधियाना के नाम से लोधी कहलाए। ब्रिटिश स्रोतो में लोधियों को उत्तर भारत से विस्थापित होना बताया गया है,जहाँ से यह लोग मध्य भारत में आ बसे। ऐसा करने में उनके सामाजिक स्तर का उत्थान हुआ, और यह लोग ब्राह्मण, बनिया व राजपूत आदि से नीचे के स्थानीय शासक तथा जमीदार बने। इनमे से कुछ बड़े जमींदार ‘ठाकुर’ की पदवी पाने में सक्षम रहे, तथा दमोह व सागर जिलो में कुछ लोधी परिवारो को पन्ना के शासक द्वारा राजा, दीवान व लंबरदार करार दिया गया। इस तरह शक्तिशाली बने लोधियों ने बुंदेला उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 कि क्रांति मे, लोधी भारत के विभिन्न भागो में अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़े। हिंडोरिया रिसायत के लोधी तालुकदार जिले के मुख्य कार्यालय की तरफ कूच करने व खजाने को लूटने में शामिल थे, जबकि शरपुरा के लोधियों ने स्थानीय पुलिस को खदेड़ दिया व उन्होने घुघरी गाँव को भी लूटा। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में हीरापुर का प्राचीन राजघराना है। इसको पहले हीरागढ़ के नाम से जाना जाता था। इस वंश के पूर्वत राजा जगन्नाथ सिंह महदी माता के उपासक थे। इसीलियें ये महदेल लोधी कहलाये। हिन्डोरिया (दमोह) में लोधी वंशजों की एक प्राचीन गढ़ी है, जिसमें लोधी राजवंश के उत्तराधिकारी निवास करते हैं। इलाक़े में आज़ भी उनका मान सम्मान क़ायम है। नरसिंहपुर जिले में लोधी परिवार बहुतायत में हैं। कृषि से प्राप्त आय का बड़ाभाग कोर्ट-कचहरी वकीलों को हर साल देते आ रहे हैं।

शाम को कम्युनिस्ट विचारधारा पर प्रयास जोशी से बातचीत चल निकली, काल मार्क्स के साम्यवादी विचार से बोल्शेविक क्रांति में ज़ारशाही के अंत से बात ईसाइयत से होती हुई यहूदी और इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर आ गई। प्रयास सहित सभी लोग बड़े तल्लीन होकर सुन रहे थे। उसी दिन बाबरी मस्जिद का निर्णय आया था अरुण भाई ने बातचीत सख़्ती से बात बंद करवा दी, उन्हें डर लगा कि कहीं कोई विडियो बनाकर दंगे  न भड़का दे। जबकि ऐसी किसी सम्भावना का दूर तक अतापता नहीं था, न तो कोई विडियो बना रहा था और न ही वहाँ मुस्लिम कम्यूनिटी थी। उसके विपरीत टेलीविजन पर और अख़बारों में निर्णय की चीरफाड़ में अधिक ख़तरनाक बहसें हो रहीं थीं, लेकिन डर का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। तभी चंगेज़ खान के पोते उलूग ख़ान की पच्चीस हज़ार फ़ौज ने डरे हुए बग़दाद के ख़लीफ़ा व उसकी दो लाख अजेय फ़ौज को हरा ख़लीफ़ा को बोरे में बाँधकर पटक-पटक कर मारा था क्योंकि ख़लीफ़ा का ख़ून ज़मीन पर गिरता तो क़यामत बरपा हो जाती, डर है ही ऐसी चीज़, जीतने और हारने वाले दोनों डरे रहते हैं। असल बिंदु पर बात आने वाली थी कि कम्युनिस्ट और मुस्लिम किसी देश को अपना नहीं मानते क्योंकि पूरी दुनिया में कम्यूनिज्म और इस्लाम फैलाना उनका धर्म है इसलिए उनकी ईमानदारी रूस-चीन  और मक्का से जुड़ी रहती है, कम्युनिस्ट धर्म को अफ़ीम मानते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टर सोच  के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोलते, दोनों लोकतंत्र पसंद नहीं करते एक सीरिया सी इस्लामिक स्टेट की तानाशाही तो दूसरा रुस सी सर्वहारा-वर्ग की तानाशाही की वकालत करते हैं, परंतु अरुण भाई ने बुरी तरह डाँट कर बात बंद करा दी। सब चुप हो गए, लम्बी चुप्पी के बाद बात के विषय को बदल दिया।   

रात को रामप्रसाद साहू के परिवार के साथ वाल्मीकि  रामायण, तुलसी कृत रामचरितमानस पर आधुनिक संदर्भ पर चर्चा हुई जिसमें बच्चों को शास्त्रों के शाश्वत मूल्य और सामयिक मूल्य का अंतर समझाया कि क़ुरान या बाइबिल के मानने वालों की तरह हिंदु 1500-2500 सालों पहले के सामाजिक मूल्यों से नहीं चिपके रहते, वे समाज की प्रगतिशीलता से तालमेल बिठाकर नई मानसिकता से नई सामाजिक व्यवस्था गढ़ना जानते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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