श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019
आज कार्तिक मास की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत
और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।
पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!
क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,
कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।
क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था, एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!
है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।
सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।
गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।
सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।
जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





