श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्रेम का प्रतिदान” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६२ ☆

☆ प्रेम का प्रतिदान ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

तुम्हारी हँसी उजली धूप की तरह

फैल गई थी चारों ओर

तुम्हारा अहसास विखर गया था

मलयानिल की गंध की तरह

तुम्हारे पाँव की पदचाप सुनकर

जाग उठे थे सप्तराग

तुम्हारे लरजते हुए होंठों पर

थिरक उठा था सामवेद का संगीत

तुम्हारे रेशमी केशों में

उलझकर रह गया था पवन

तुम्हारी दृष्टि में

समा गया था सारा ब्रम्हाण्ड

तुम्हारी समूची देहयष्टि से

जगमगा उठा था मेरा घर-आँगन

मैं आज भी बैठा हूँ

उन यादों के ढूह पर निहारता

शायद फिर लौट आए कोई दिन

जो दे सके प्रेम का प्रतिदान

और मैं जी सकूँ भोगा हुआ यथार्थ।

****

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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