श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५१ ☆

☆ पुस्तक चर्चा – टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना –  लेखक : श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

 

पुस्तक : टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना

विधा : बाल कहानी-संग्रह

कहानीकार : राजकुमार जैन ‘राजन’

प्रकाशक : ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल

संस्करण : 2026

मूल्य : 200 रुपए

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

☆ ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ : बालमन में जिज्ञासा, संवेदना और सामाजिक चेतना जगाता कहानी-संग्रह – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

राजकुमार जैन ‘राजन’ ऐसे कहानीकार हैं जिनकी रचनात्मक चिंतन का केंद्र बालक होता है। उनकी दृष्टि में बाल कहानी केवल बच्चे का मनोरंजन करने वाली रचना नहीं होती है, बल्कि उसके भीतर जिज्ञासा, संवेदना, साहस, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करने वाला माध्यम होती है। टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना की ‘अपनी बात’ में स्वयं लेखक कहानी को अंधेरे में राह दिखाने वाला दीपक और छोटे-छोटे हाथों में बड़े सपने भरने वाला माध्यम मानते हैं। वे विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि आज के बच्चे के पास सूचना बहुत है, लेकिन समय कम है; इसलिए ऐसी कहानियों की जरूरत है जो छोटी हों, रोचक हों और पढ़ने के बाद बच्चे को सोचने के लिए विवश करें।

रचनाकार अपने आसपास के वातावरण, अपने अनुभवों, गाँव की गलियों, विद्यालय की कक्षाओं और बच्चों की सहज बातचीत से कहानियों के कथानक ग्रहण करता है। यह बात उनकी रचना-दृष्टि को कृत्रिम होने से बचाती है। उनके पात्र प्रायः हमारे आसपास के बच्चे, माता-पिता, शिक्षक, दादा-दादी और ग्रामीण समाज से आते हैं। पुस्तक के समर्पण में वे वरिष्ठ साहित्यकार स्व. गोविंद शर्मा को अपना प्रेरणास्रोत और संरक्षणदाता बताते हुए उन्हें अपनी कृति समर्पित करके अपनी रचनाधर्मिता को प्रदर्शित करके उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

राजन की रचना-दृष्टि की विशेषता यह है कि वे बच्चों को केवल ‘सिखाने’ की मुद्रा में नहीं आते; वे उन्हें परिस्थितियों से गुजरते हुए सीखने का अवसर देते हैं। यही कारण है कि उनकी अनेक कहानियों में बाल पात्र स्वयं प्रश्न करते, पहल करते, समस्या पहचानते हैं और उसके समाधान में भाग लेते हैं।

बाल साहित्य की उपयोगिता : मनोरंजन से आगे की यात्रा

बाल साहित्य बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण साधन होता है। कहानी बालक को संसार से परिचित कराने के साथ-साथ उसे दूसरों की परिस्थितियों को समझना, प्रश्न करना, कल्पना करना और निर्णय लेना सिखाती है। अच्छी बाल कहानी में मनोरंजन और संस्कार के बीच संतुलन होना चाहिए। केवल उपदेश बालक को आकर्षित नहीं करता और केवल मनोरंजन उसके व्यक्तित्व को आवश्यक दिशा नहीं देता है।

राजकुमार जैन ‘राजन’ की दृष्टि भी इसी संतुलन की ओर दिखाई देती है। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में वे स्पष्ट करते हैं कि बच्चे उपदेश से नहीं, उदाहरण से सीखते हैं। इसलिए संग्रह की कहानियों में पर्यावरण-संरक्षण, शिक्षा, समान अवसर, स्वतंत्रता, ईमानदारी, सहयोग, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना जैसे विषय कथा-स्थितियों के माध्यम से सामने आते हैं।

आज जब बच्चों के सामने इंटरनेट, मोबाइल और त्वरित सूचना का संसार भरा पड़ा है, तब भी पुस्तक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है; बल्कि उसका स्वरूप और महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। पुस्तक में लेखक स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों के पास जानकारी बहुत है, पर समय कम है। इसलिए ऐसी कहानियाँ आवश्यक हैं जो कम समय में प्रभावी अनुभव दें और पढ़ने के बाद भी मन में बनी रहें।

इस दृष्टि से टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना उपयोगी बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि इसकी कहानियाँ ज्ञान को कथा के भीतर पिरोने का प्रयास करती हैं।

इस समीक्ष्य संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं—‘पारूल का सपना’, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘शिक्षा का उजाला’, ‘खिलौना रोबोट’, ‘सच्ची दिवाली’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘स्वतंत्रता का उत्सव’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’, ‘खुशी दो, खुशी लो’ और ‘बच्चों का वाचनालय’।

‘पारूल का सपना’ बालिका के स्वप्न, आत्मविश्वास और अवसर की समानता को केंद्र में रखकर लिखी गई है। पारूल विमान देखकर पायलट बनने का सपना देखती है। परिवार की ओर से आरंभिक संकोच के बावजूद वह अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहती है, अध्ययन करती है, विज्ञान मेले में विमान का मॉडल बनाती है और अंततः अपने सपने की दिशा में आगे बढ़ती है। यह कहानी बालिकाओं की आकांक्षाओं को सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर देखने की प्रेरणा देती है।

‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में दादाजी और बच्चों के माध्यम से पर्यावरण-संरक्षण की चेतना विकसित होती है। कहानी की विशेषता यह है कि वृक्षारोपण किसी भाषण का विषय न रहकर बच्चों की सक्रिय भागीदारी बन जाता है। दादाजी बच्चों को पौधे लगाने, उनकी देखभाल करने और प्रकृति के महत्त्व को समझने का अवसर देते हैं।

‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में बच्चों का सामूहिक प्रयास सामाजिक परिवर्तन का रूप लेता है। बच्चे प्लास्टिक से पशुओं और मनुष्यों को होने वाले नुकसान को समझते हैं, अभियान चलाते हैं, कपड़े की थैलियों का प्रयोग बढ़ाते हैं और पशुओं के लिए भोजन-पेटियाँ रखते हैं। कहानी की उपयोगिता इस से समझा जा सकता है कि इसमें बालक समस्या के दर्शक नहीं, समाधान के सहभागी बनते हैं।

‘शिक्षा का उजाला’ शिक्षा के अभाव, गलत संगति और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से जूझते रोहित की कथा प्रस्तुत करती है। उसके भीतर की प्रतिभा को परिस्थितियाँ दबाती हैं, लेकिन आगे चलकर जीवन के अनुभव उसे अपनी भूल का अहसास कराते हैं। कथा शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन न मानकर जीवन को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

‘खिलौना रोबोट’ आधुनिक तकनीक, बालमन और पारिवारिक संबंधों से जोड़ती है। रोबोट बच्चे के लिए आकर्षण का केंद्र है, लेकिन कथा का वास्तविक केंद्र मानवीय संबंध और समझ है। इस कहानी में आधुनिक वस्तु धीरे-धीरे आगे चलकर मानवीय संवेदना का माध्यम बन जाती है।

‘सच्ची दिवाली’ त्यौहार के अर्थ को सामाजिक संवेदना से जोड़कर प्रस्तुत करती है। घर को रोशन करने के साथ दूसरों के घरों का अँधेरा दूर करना ही सच्चे उत्सव का अर्थ है—कहानी इसी मानवीय विचार को कथा में रूप में हमारे सम्मुख लाती है।

‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ संग्रह की शीर्षक-कहानी है और विज्ञान, कल्पना तथा ज्ञान को एक साथ उभारती है। प्रोफेसर, बच्चे और रोबोट मिलकर समय की यात्रा की कल्पना करते हैं। कहानी का महत्त्व इस बात से उजागर होता है कि समय-यात्रा के रोमांच को केवल चमत्कार न बनाकर अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने के विचार से जोड़ा गया है। अंततः ज्ञान बाँटने को ही वास्तविक उपलब्धि माना गया है।

‘स्वतंत्रता का उत्सव’ कहानी स्वतंत्रता के अर्थ को पक्षी के माध्यम से प्रतीकात्मक ढंग से सामने लाती है। सोने का पिंजरा भी पिंजरा ही है—यह बिंब स्वतंत्रता के वास्तविक मूल्य को बालमन तक सरलता से पहुँचाया जाता है।

‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ साहस, निरीक्षण-शक्ति और तर्कबुद्धि की कहानी है। जहाँ बड़े लोग अंधविश्वास और भय के प्रभाव में आ जाते हैं, वहाँ दीपू परिस्थितियों को समझने की कोशिश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से रहस्य का समाधान करना कहानी को विशेष रूप से उपयोगी बनाता है।

‘खुशी दो, खुशी लो’ इस संग्रह की सबसे अधिक मानवीय और संवेदनात्मक कहानियों में एक है। जादुई रूमाल का बाहरी आकर्षण अंततः इस बोध में बदल जाता है कि खुशी किसी वस्तु में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति किए गए छोटे-छोटे सद्भावपूर्ण व्यवहार में निहित है। कहानी का अंतिम बोध—खुशी देने वाले के हृदय में होती है—बालक के लिए सहज और प्रभावशाली है।

‘बच्चों का वाचनालय’ संग्रह की सबसे उपयोगी सामाजिक कल्पनाओं में से एक है। पारूल और उसके भाई गाँव के एक पुराने खंडहर को बच्चों के वाचनालय में बदलने की योजना बनाते हैं। बच्चे स्वयं सफाई करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं, पढ़ने का कार्यक्रम बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरा समुदाय उससे जुड़ जाता है। अंततः प्रशासन भी इस पहल को देखकर भवन को पुस्तकालय में बदल देता है।

कथा-तत्त्वों की दृष्टि से मूल्यांकन:

कहानी के प्रमुख तत्त्वों में कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य और प्रभाव को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस कसौटी पर यह संग्रह अनेक उल्लेखनीय विशेषताएँ प्रस्तुत करता है।

  1. कथानक

संग्रह के अधिकांश कथानक सरल, रैखिक और बालकेंद्रित हैं। इनमें समस्या आती है, पात्र उसके सामने खड़े होते हैं और प्रयास के माध्यम से समाधान तक पहुँचते हैं। ‘पारूल का सपना’ में सपना लक्ष्य बनता है, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में समस्या सामाजिक अभियान में बदलती है और ‘बच्चों का वाचनालय’ में एक छोटी-सी कल्पना सामुदायिक आंदोलन का रूप लेती है।

कथानकों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी क्रियाशीलता है। बच्चे केवल घटना के साक्षी नहीं रहते; वे घटनाओं को आगे बढ़ाते हैं। यह बाल साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण गुण है।

  1. पात्र-योजना

राजन की कहानियों में बाल पात्र अपेक्षाकृत सक्रिय और आत्मविश्वासी रूप में सामने आते हैं। पारूल, रोहित, दीपू और वाचनालय के बच्चे अपनी परिस्थितियों से संवाद करते हैं। दादाजी, शिक्षक और परिवार के बड़े पात्र मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।

विशेष रूप से पारूल का चरित्र उल्लेखनीय है। उसका सपना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं रह जाता है; वह बालिका के आत्मविश्वास और समान अवसर की आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार वाचनालय की कहानी में बच्चों का सामूहिक चरित्र एक व्यक्ति से आगे बढ़कर ‘बच्चों की सामूहिक शक्ति’ का प्रतिनिधित्व करता है।

  1. संवाद

संवादों की भाषा सामान्यतः सहज और बोलचाल की भाषा है। यह बाल पाठक को पात्रों के अधिक निकट लाती है। कई जगह संवाद ही कहानी का विचार स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए ‘पारूल का सपना’ में पायलट बनने के प्रश्न पर पारूल का आत्मविश्वास कहानी के विचार को सीधे सामने लाता है।

हालाँकि कुछ स्थानों पर संवाद अपेक्षाकृत अधिक व्याख्यात्मक हो जाते हैं। पात्र कभी-कभी उतना ही कहते हैं जितना लेखक पाठक को समझाना चाहता है। यदि ऐसे संवादों को थोड़ा संक्षिप्त और स्वाभाविक किया जाए तो कथा की कलात्मकता और बढ़ सकती है।

  1. वातावरण

ग्रामीण जीवन की प्रस्तुति इस संग्रह की बड़ी ताकत है। गाँव की गलियाँ, विद्यालय, बगीचे, खेत, खंडहर, पंचायत और परिवार—ये सब कहानियों को स्थानीय धरातल प्रदान करते हैं। इससे बच्चे कथाओं से सहज जुड़ते हैं। स्वयं लेखक ने भी स्पष्ट किया है कि उनकी कहानियों का स्रोत गाँव की गलियाँ, स्कूल की कक्षाएँ और बच्चों की मासूम बातें हैं।

वातावरण केवल सजावटी नहीं है। ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में गाँव अभियान का क्षेत्र बनता है, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में बगीचा सीखने का स्थल और ‘बच्चों का वाचनालय’ में खंडहर ज्ञान के केंद्र में बदल जाता है।

  1. भाषा-शैली

लेखक ने जान-बूझकर सरल भाषा अपनाई है। कठिन शब्दों और भारी-भरकम उपदेशात्मक भाषा से बचने का प्रयास पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी स्पष्ट दिखाई देता है।

यह सरलता बाल पाठक के लिए उपयोगी है। वाक्य सामान्यतः सीधे, सरल और सहज हैं और घटनाएँ क्रम से आगे बढ़ती हैं। कई जगह हास्य, कौतूहल और भावुकता का संतुलित प्रयोग भी दिखाई देता है।

लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यही सरलता कुछ जगहों पर अतिसरलीकरण में बदल जाती है। कुछ कहानियों के अंत में संदेश अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है, जबकि साहित्यिक कहानी में कई बार संकेत पाठक पर छोड़ देना अधिक प्रभावी होता है। बालक को निष्कर्ष तक स्वयं पहुँचने का अवसर मिले तो कहानी का प्रभाव अधिक स्थायी हो सकता है।

  1. कल्पना और फैंटेसी

संग्रह की शीर्षक-कहानी में टाइम मशीन और रोबोट का प्रयोग तथा ‘खुशी दो, खुशी लो’ में जादुई रूमाल जैसे तत्व कल्पना को विस्तार देते हैं। इनका उद्देश्य केवल चमत्कार पैदा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और मानवीय मूल्यों को रोचक बनाना है।

यहाँ लेखक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है—वे विज्ञान और कल्पना को नैतिक बोध से जोड़ते हैं। टाइम मशीन अतीत की यात्रा का उपकरण होने के साथ सीखने का माध्यम बनती है और जादुई रूमाल अंततः वस्तु से अधिक मनुष्य के व्यवहार का प्रतीक बन जाता है।

  1. उद्देश्य और संदेश

लगभग सभी कहानियों के पीछे स्पष्ट सामाजिक या नैतिक उद्देश्य है—शिक्षा, पर्यावरण, स्वतंत्रता, सहयोग, वैज्ञानिक दृष्टि, समान अवसर, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना। यह उद्देश्यपरकता पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति भी है और आलोचना की दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।

शक्ति इसलिए कि बालक कहानी समाप्त होने के बाद किसी विचार के साथ लौटता है; चुनौती इसलिए कि कहीं-कहीं कथा से संदेश स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय लेखक द्वारा स्पष्ट कर दिया जाता है।

समीक्षात्मक समालोचना:

टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना मूलतः उद्देश्यपरक और मूल्यपरक बाल कहानी-संग्रह है। इसका केंद्रीय आग्रह यह है कि बालक जिज्ञासु बने, पढ़े, प्रश्न करे, अपने आसपास की समस्याओं को पहचाने और उन्हें बदलने के लिए स्वयं पहल करे। यह दृष्टि संग्रह को महज मनोरंजनात्मक बाल साहित्य से अलग करती है।

संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है बालक को समस्या-समाधानकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना। पारूल अपने सपने के लिए प्रयास करती है, बच्चे गाँव को प्लास्टिक से मुक्त करने का अभियान चलाते हैं, दीपू ठगों की चाल समझता है और बच्चे खंडहर को वाचनालय में बदल देते हैं। इस तरह लेखक बच्चों के भीतर निहित परिवर्तनकारी शक्ति पर विश्वास व्यक्त करते हैं।

दूसरी बड़ी उपलब्धि है विषय-विविधता। पर्यावरण से लेकर शिक्षा तक, तकनीक से लेकर स्वतंत्रता तक और व्यक्तिगत सपने से लेकर सामुदायिक पुस्तकालय तक—कहानीकार ने बच्चों के जीवन से जुड़े अनेक विषयों को कथा में समेटा है। विषय-सूची भी इस विविधता को स्पष्ट करती है।

तीसरी विशेषता है स्थानीयता और जीवन-संबंध। कहानियाँ किसी अमूर्त आदर्शलोक में नहीं घटतीं। गाँव, घर, स्कूल, बाजार, बगीचा और परिवार उनके संसार का हिस्सा हैं। इसलिए बच्चों को इनमें अपना परिवेश दिखाई देता है।

फिर भी एक गंभीर समीक्षक के रूप में कुछ सीमाओं की ओर संकेत करना आवश्यक है। पहली सीमा यह है कि अनेक कहानियों में उपदेश का अनुपात कथा की तुलना में कुछ अधिक हो जाता है। लेखक जिस बात को कहानी के माध्यम से पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं, उसे कई बार पात्रों के संवाद में सीधे कह देते हैं। इससे कहानी का कलात्मकता प्रभावित होती है।

दूसरी सीमा आदर्श समाधान की तीव्रता है। कुछ कथाओं में समस्या अपेक्षाकृत शीघ्र और सुंदर ढंग से हल हो जाती है। वास्तविक जीवन की जटिलताओं की तुलना में ये समाधान कभी-कभी बहुत सरल प्रतीत होते हैं। यदि कहीं-कहीं संघर्ष, असफलता, संशय और पुनः प्रयास के लिए अधिक स्थान दिया जाता, तो पात्र अधिक त्रिआयामी और कथाएँ अधिक विश्वसनीय बन सकती थीं।

तीसरी बात चरित्र-विकास से जुड़ी है। कुछ पात्र कथा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए निर्मित प्रतीत होते हैं। यदि उनके भीतर अधिक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, व्यक्तिगत कमजोरियाँ और परिवर्तन की क्रमिक प्रक्रिया दिखाई जाती, तो संग्रह का साहित्यिक स्तर और ऊँचा हो सकता था।

इन सीमाओं के बावजूद हमें बाल साहित्य को लक्षित पाठकीयता के संदर्भ में देखना चाहिए। लेखक का प्राथमिक उद्देश्य जटिल मनोवैज्ञानिक कथा रचना नहीं, बल्कि बच्चों में पढ़ने, सोचने, प्रश्न करने और सकारात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति पैदा करना है। इस दृष्टि से उनकी कथात्मक रणनीति समझ में आती है। जिसकी वजह से वे सरल, सहज और आकर्षक कहानियां प्रस्तुत कर पाए हैं।

निष्कर्ष:

संक्षेप में कहे तो टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना ऐसा बाल कहानी-संग्रह है जिसमें ज्ञान और कल्पना, मनोरंजन और संस्कार, व्यक्ति और समाज तथा वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

इस संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि लेखक बच्चों को केवल ‘अच्छा बच्चा’ बनने का उपदेश नहीं देते; वे उन्हें कुछ करने, प्रश्न उठाने और अपने आसपास परिवर्तन लाने वाले पात्रों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी लेखक का आग्रह है कि बच्चों से कहानियों पर चर्चा की जाए और उनसे पूछा जाए कि वे पारूल की जगह होते तो क्या करते या अपने गाँव-मोहल्ले के लिए क्या कर सकते हैं।  यही आग्रह इस संग्रह की वास्तविक शैक्षिक शक्ति है।

विशेष रूप से ‘पारूल का सपना’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ और ‘बच्चों का वाचनालय’ जैसी कहानियाँ बालक को निष्क्रिय पाठक न बनाकर सहभागी बनाने की कोशिश करती हैं। ‘बच्चों का वाचनालय’ तो पुस्तक-पठन को सीधे सामुदायिक जीवन से जोड़ते हुए यह विश्वास पैदा करती है कि संसाधनों की कमी हमेशा ज्ञान की कमी नहीं होती; इच्छा, सहयोग और पहल हो तो एक खंडहर भी ज्ञान के केंद्र में बदला जा सकता है।

अंततः कहा जा सकता है कि राजकुमार जैन ‘राजन’ का यह संग्रह बालमन में जिज्ञासा जगाने, संवेदना विकसित करने और सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देने वाला उपयोगी प्रयास है। साहित्यिक कसौटी पर इसमें उपदेशात्मकता और आदर्शवादी समाधान जैसी सीमाएँ अवश्य हैं, लेकिन इसकी विषयगत विविधता, सरल भाषा, बाल-केंद्रित दृष्टि, सामाजिक सरोकार और बच्चों को सक्रिय भूमिका देने की प्रवृत्ति इसे समकालीन बाल साहित्य में महत्त्वपूर्ण बनाती है।

यह पुस्तक बच्चे को केवल यह नहीं बताती कि क्या अच्छा है, बल्कि बार-बार यह प्रश्न उसके सामने रखती है कि अच्छा करने के लिए वह स्वयं क्या कर सकता है। यही इस कहानी-संग्रह का सबसे मूल्यवान पक्ष है। इस बेहतरीन कहानी संग्रह के लिए राजकुमार जैन राजन को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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