श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘भ्रम / सत्य…‘।)

☆ शशि साहित्य # ४२ ☆

? कविता – भ्रम / सत्य…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

बहुत भरम में थी मैं,

खुशी को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

अंतर मन में युद्ध चल रहा,

उसको शांत करूं कैसे मैं…

*

प्रीत लगाऊं प्रीतम से मैं,

मीरा बन सब त्यागूं मैं,

*

राधा से भी प्रीत करे वो,

यह कैसे स्वीकार करूं मैं…

*

नहीं चाहिए अब कोई मुझको,

नहीं ढूंढ सकी, कोई, मुझसा, मैं…

*

नहीं चाहिए कोई इंद्रधनुष,,

अब अपने रंग में खुश हूं मैं…

*

भीतर, बाहर रणक्षेत्र बना है,

क्यों ना बिगुल, युद्ध का फूंकूं मैं…

*

बहुत भरम में थी मैं,

खुद को बाहर ढूंढ रही मैं…

*

जब से तेरी शरण में आई !!!

देखो खुद से, खुद ही मिल गई मैं…

*

नहीं रचा तूने खुद सा कोई…

तुझ में ही अब रम गई मैं…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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