डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४८
कविता – प्रयोजन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
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भूख तो मिली मगर भोजन नहीं मिला
जिंदगी का यारो प्रयोजन नहीं मिला
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इंजन हुआ जब फेल मेरा बीच सड़क पर
धूप में बैठे रहे टोचन नहीं मिला
=3=
न काम आए कोई भी वक्ता भविष्य के
हमको कोई संकट मोचन नहीं मिला
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दूजों के आयोजन में कई बार हम गए
हमको मगर कोई संयोजन नहीं मिला
=5=
क्या करें तुम्हीं कहो मन की क़िताब का
पाठक ना मिले जिसको विमोचन नहीं मिला
=6=
सम्मेलनों में गीत-ग़ज़ल आ तो रहे हैं
मंचों को पर सार्थक सृजन नहीं मिला
=7=
गोते ही न लगाऊँ जिनमें डूब भी जाऊँ
‘राजेश’ ऐसा झील सा लोचन नहीं मिला
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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