श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री मधुर कुलश्रेष्ठ एवं श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा सम्पादित “गौरवी” कहानी संग्रह : खंड १ एवं २ पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१९ ☆
☆ “गौरवी” कहानी संग्रह : खंड १ एवं २ – संपादक : मधुर कुलश्रेष्ठ एवं नीलम कुलश्रेष्ठ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहानी संग्रह : गौरवी, प्रथम खंड : महिलाओं के उद्गार
संपादक : मधुर कुलश्रेष्ठ एवं नीलम कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक : लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर
प्रथम संस्करण : सितंबर 2026
मूल्य : ₹300
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ गौरवी : प्रथम खंड – स्त्री संघर्ष के विविध स्वर और आत्मसम्मान की तलाश – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
स्त्री जीवन के संघर्ष, अंतर्द्वंद्व, सामाजिक असमानता और आत्मसम्मान की जिजीविषा को केंद्र में रखकर मधुर कुलश्रेष्ठ एवं नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा संपादित कहानी संग्रह गौरवी का प्रथम खंड समकालीन हिंदी कथा साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। महिला लेखिकाओं की चौबीस कहानियों का यह संकलन स्त्री जीवन के अनेक परिचित और अनदेखे पक्षों को सामने लाता है। इसकी विशेषता यह है कि यहाँ स्त्री केवल पीड़ा सहने वाली पात्र नहीं, बल्कि परिस्थितियों से जूझती, निर्णय लेती और अपने अस्तित्व की राह तलाशती मनुष्य के रूप में उपस्थित है।
नीलम कुलश्रेष्ठ की आशाओं का आँचल जीवन की निराशाजनक परिस्थितियों के बीच उम्मीद बनाए रखने का संदेश देती है। डॉ. हंसा दीप की लोई में विधवा जीवन की त्रासदी, सामाजिक रूढ़ियों और आत्मनिर्भरता की यात्रा को प्रभावशाली प्रतीक के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली है। आटे को बार बार कूटने, मसलने और आकार देने की प्रक्रिया स्त्री के जीवन संघर्ष का रूपक बन जाती है। यह कहानी बताती है कि चोटों से टूटने के बजाय मनुष्य अपने भीतर नई आकृति गढ़ने की शक्ति भी विकसित कर सकता है।
संग्रह की अन्य कहानियाँ भी स्त्री अनुभवों के विविध धरातलों को उजागर करती हैं। कहीं पारिवारिक रिश्तों की संवेदनहीनता है, कहीं वृद्धावस्था में उपेक्षा, कहीं विवाह संस्था के भीतर छिपा छल और आर्थिक निर्भरता का संकट। रंक, चाँदनी से धधकती राख तक, शेषकथा, बेबस माँ, जया का धैर्य, शीशे में बची औरत तथा बंद दरवाजे के उस पार जैसी कहानियाँ अपने कथ्य और परिवेश के माध्यम से स्त्री की असुरक्षा, संबंधों की जटिलता और आत्मसम्मान की आवश्यकता पर विचार करने को प्रेरित करती हैं। अंबे जैसी कथा सामाजिक और आर्थिक विवशताओं के उस कठोर संसार तक ले जाती है, जहाँ अन्याय के विरुद्ध स्त्री का प्रतिरोध भी नैतिक प्रश्नों और परिस्थितियों की जटिलता से घिरा रहता है। हम डायन नै हिअ जैसी कहानी अंधविश्वास और सामाजिक कलंक के बीच स्त्री की मानवीय पहचान को रेखांकित करती है।
इन कहानियों की उल्लेखनीय विशेषता उनका सामाजिक और भौगोलिक विस्तार है। ग्रामीण जीवन की रूढ़ियों से लेकर शहरी मध्यवर्ग की समस्याओं तक, पारिवारिक संबंधों से लेकर आर्थिक स्वावलंबन तक, स्त्री के संघर्ष के अनेक रूप यहाँ दिखाई देते हैं। कुछ कहानियाँ भावनात्मक करुणा को प्रमुखता देती हैं, तो कुछ सामाजिक व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर प्रश्न उठाती हैं। कहीं संघर्ष का समाधान आत्मनिर्भरता में मिलता है, कहीं अपने अधिकारों के लिए खड़े होने में और कहीं जीवन की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संवेदना बचाए रखने में।
इस संदर्भ में गौरवी के दोनों खंडों को साथ रखकर देखना विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। प्रथम खंड में महिला लेखिकाएँ स्त्री के अंतर्मन, उसके भावनात्मक द्वंद्व, घरेलू अनुभवों और सामाजिक दबावों को अपेक्षाकृत अधिक निकटता से सामने लाती हैं। इन रचनाओं में स्त्री की अपनी आवाज, उसकी स्मृतियाँ और उसकी निजी दुनिया प्रमुख हैं। द्वितीय खंड में पुरुष लेखकों की उन्नीस कहानियाँ स्त्री जीवन को दूसरी दृष्टि से देखती हैं। वहाँ भी असुरक्षा, शोषण, आर्थिक स्वाधीनता, आत्मसम्मान और रिश्तों की संवेदनशीलता जैसे प्रश्न प्रमुख हैं। दोनों खंडों का साझा उद्देश्य स्त्री को केवल पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं में सीमित न रखकर स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता रेखांकित करना है।
यह तुलना किसी एक दृष्टि को श्रेष्ठ ठहराने के लिए नहीं, बल्कि दोनों के परस्पर पूरक योगदान को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। महिला लेखन स्त्री के अनुभवों की आंतरिक परतें खोलता है, जबकि पुरुष लेखन सामाजिक व्यवहार और स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार का अवसर देता है। साहित्य की सार्थकता तब बढ़ती है, जब अनुभव की प्रामाणिकता और संवेदना की व्यापकता मिलकर पाठक की दृष्टि को अधिक मानवीय बनाती हैं।
समग्रतः गौरवी का प्रथम खंड स्त्री संघर्ष के विविध स्वरों, संबंधों की जटिलताओं और आत्मसम्मान की आकांक्षा का संवेदनशील दस्तावेज है। कुछ कहानियों में भावुकता और घटनात्मकता अधिक दिखाई दे सकती है, फिर भी संग्रह का केंद्रीय सरोकार महत्त्वपूर्ण है। संपादक मधुर कुलश्रेष्ठ एवं नीलम कुलश्रेष्ठ ने स्त्री विमर्श को दो खंडों में प्रस्तुत करके संवाद की व्यापक जमीन तैयार की है। दोनों खंडों का संयुक्त पाठ स्त्री जीवन को समझने और उसके प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बदलने की दिशा में उपयोगी है।
मेरी आकांक्षा है कि गौरवी जैसी साहित्यिक पहलें समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित समाज के निर्माण में योगदान दें, जहाँ स्त्री को अपने अधिकारों और स्वतंत्र पहचान के लिए निरंतर संघर्ष न करना पड़े। इस सार्थक संपादकीय प्रयास के लिए कुलश्रेष्ठ दंपति बधाई के पात्र हैं।
चर्चा – विवेक रंजन श्रीवास्तव
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☆ गौरवी : द्वितीय खंड – स्त्री संघर्ष की कथा और संवेदना का आईना – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहानी संग्रह: गौरवी, (द्वितीय खंड : पुरुष लेखकों के उद्गार)
संपादक : मधुर कुलश्रेष्ठ एवं नीलम कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक : लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर
प्रथम संस्करण : सितंबर 2026
मूल्य : ₹225
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव
महिलाओं के जीवन को समझना ,उसकी पीड़ा का वर्णन उन सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक संरचनाओं को पहचानना , जो नारी के व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और अस्मिता को प्रभावित करती हैं, इस सब पर स्त्री विमर्श साहित्य में बहुत कुछ लिखा जा रहा है।
मधुर कुलश्रेष्ठ और नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा संपादित कहानी संग्रह गौरवी, इसी दिशा में एक बहुत महत्त्वपूर्ण गम्भीर साहित्यिक प्रयास है।
इसी परिदृश्य की महिला लेखिकाओं की कहानियां गौरवी के प्रथम खंड में एवं
पुरुष लेखकों की उन्नीस कहानियों का संकलन द्वितीय खंड में पुस्तकाकार संग्रहित किया गया है।
स्त्री के संघर्ष, अंतर्द्वंद्व, आत्मसम्मान और जीवन के प्रति उसकी जिजीविषा को विविध परिवेशों में सामने लाती कहानियां मनोरंजन से बढ़कर वैचारिक दृश्य रचती हैं।
विभिन्न कहानियों में कहीं स्त्री अपने ही परिवार में असुरक्षित है, कहीं समाज की संदेह भरी दृष्टि से जूझ रही है, तो कहीं आर्थिक आत्मनिर्भरता और भावनात्मक सहारे के बीच अपने जीवन का अर्थ तलाश रही है। इन कहानियों में स्त्री केवल करुणा की पात्र नहीं, निर्णय लेने वाली, प्रतिरोध करने वाली और अपने अस्तित्व की राह बनाने वाली मनुष्य के रूप में भी उपस्थित है।
मधुर कुलश्रेष्ठ की हम हँ ना ! में सुरीली का जीवन अनेक आघातों और विडंबनाओं से गुजरता है। बाल्यकाल की संभावनाओं से शुरू हुई उसकी यात्रा पारिवारिक उपेक्षा, असुरक्षा और कठिन संघर्षों तक पहुँचती है। कहानी पाठक को झकझोरती है , यह स्त्री जीवन की उन परतों को खोलती है, जिन्हें सामान्य सामाजिक दृष्टि अक्सर अनदेखा कर देती है।
संदीप तोमर की सजीव आत्मीयता रिश्तों की पारंपरिक परिभाषाओं पर विचार करने को प्रेरित करती है। सुलेखा और हेमंत के संबंध में रक्त संबंध से परे विकसित आत्मीयता, सहयोग और भावनात्मक निकटता के प्रश्न उभरते हैं। कहानी यह संकेत देती है कि मनुष्य को केवल सामाजिक मान्यताओं के आधार पर नहीं, उसके व्यवहार और संवेदनशीलता के आधार पर भी समझा जाना चाहिए।
फारूक आफरीदी की कहानी, वह अकेली नहीं थी महानगरीय जीवन में अकेली स्त्री की चुनौतियों को सामने लाती है। सुन्दन्दा का संघर्ष निजी दुःख से आगे बढ़कर दूसरी संघर्षरत महिलाओं के लिए अवसर निर्मित करने तक पहुँचता है। उसकी सोच का सार इन शब्दों में व्यक्त होता है, “घर वह नहीं होता, जहाँ औरत सिर्फ सहती रहे। घर वह है, जहाँ इंसान को सम्मान मिले।” यह कथन कहानी की वैचारिक धुरी है। आर्थिक स्वावलंबन, सामाजिक पूर्वाग्रह और स्त्री की गरिमा को जोड़ती यह कथा सहानुभूति से आगे बढ़कर सहभागिता का रास्ता सुझाती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव की अस्तित्व की दहलीज में स्त्री की आत्मनिर्भरता का प्रश्न विशेष अर्थ ग्रहण करता है। जीवनसाथी का वास्तविक सहयोग केवल संरक्षण देना नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़े होने के योग्य बनाना भी है। इसी भाव को व्यक्त करती पंक्ति, “अपनी उड़ान खुद तय करो”, स्त्री की स्वतंत्र पहचान और निर्णय क्षमता का सार प्रस्तुत करती है। प्रेम और स्वतंत्रता के बीच संतुलन का यह विचार कहानी को सकारात्मक वैचारिक आधार देता है।
पंकज त्रिवेदी की सवली ग्रामीण समाज, सामंती दबाव और लोकापवाद के बीच स्त्री के साहस को रेखांकित करती है। सवली का प्रतिरोध बताता है कि परिस्थितियों से विवश होना और अन्याय के सामने झुक जाना एक ही बात नहीं है। दूसरी ओर, साबिरा करुणा, क्षमा और मानवीय संबंधों की जटिलता को सामने लाती है। अम्मा जैसी कहानी घरेलू जीवन की छोटी-छोटी वस्तुओं और स्मृतियों के माध्यम से उस स्त्री संसार को महत्त्व देती है, जिसका श्रम और भावनात्मक योगदान अक्सर परिवार की सामान्य दिनचर्या मानकर भुला दिया जाता है।
इन कहानियों को एक साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि स्त्री संघर्ष का कोई एक रूप नहीं है। वह कभी हिंसा और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध है, कभी आर्थिक स्वाधीनता की खोज, कभी आत्मसम्मान की रक्षा, तो कभी संबंधों में मानवीय गरिमा बचाए रखने का प्रयास। संग्रह की क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता इस अनुभव संसार को व्यापक बनाती है।
कथा संकलन , स्त्री अस्मिता के मूल भाव की कहानियों के चलते हिंदी जगत में व्यापक साहित्यिक संभावनाओं की जमीन तैयार करता है।
स्त्री विमर्श की सार्थकता केवल अन्याय दिखाने में नहीं, बल्कि पात्रों की जटिल मनःस्थितियों, उनकी आकांक्षाओं और उनके निर्णयों को विश्वसनीय कलात्मक रूप देने में भी है।
समग्रतः पुरुष लेखकों की कलम से रचा गौरवी, द्वितीय खंड संवेदना, सामाजिक प्रश्नों और स्त्री अस्मिता पर केंद्रित एक विचारोत्तेजक कहानी संग्रह है।
इसका महत्त्व इस बात में है कि यह स्त्री को केवल किसी की बेटी, पत्नी, माँ या बहू के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र इच्छाओं, अधिकारों और संभावनाओं वाले व्यक्तित्व के रूप में देखने का आग्रह करता है। पुरुष लेखकों की दृष्टि से स्त्री जीवन का यह चित्रण तब अधिक सार्थक बनता है, जब वह स्त्री के लिए बोलने के बजाय उसकी आवाज़, उसकी स्वायत्तता और उसके अनुभवों को समझने का अवसर देता है।
यह संग्रह पाठक को केवल भावुक नहीं करता, बल्कि अपने सामाजिक व्यवहार और स्त्री के प्रति स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है। यही इसकी साहित्यिक उपलब्धि और इसकी प्रासंगिकता है। संग्रह निश्चित ही दीर्घ जीवी, चर्चित होगा । मेरी आकांक्षा है कि ये कहानियां स्त्री समानता का ऐसा समाज रचने का वैचारिक परिवेश निर्मित कर सके जिससे स्त्री विमर्श की आवश्यकता ही गौण हो सके।
इस अभिनव पहल के लिए कुलश्रेष्ठ दंपति पुनः बधाई के सुपात्र हैं।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







