सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ आलेख ☆
☆ ग़ज़ल की रूह है मोहब्बत—बशीर बद्र ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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“न जी भर के देखा न कुछ बात की।
बड़ी आरजू थी मुलाकात की।।
उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनाई ख़यालात की।।”
रेशमी रूमान जो दिल को पहली बारिश सा भिगो दे, वो भीने भीने जज़्बात जो शब्दों की पकड़ में आते ही जैस्मिन से महकने लगें ,वो नफासत, वो बारीकी जैसे किसी संगतराश की कला में होती है, शब्दों की सुर लहर जो कुछ पल के लिए दूसरी दुनिया में ले चले ,जर्रे-जर्रे में रोशनी का दीदार करवाए ,इन्द्रधनुष धरती पर उतार लाए,ऐसी है शायरी बशीर बद्र की ।
शब्दों पर उनकी हुकूमत के क्या कहने ,मजाल है जो मखमली एहसास का कोई भी सिरा छूट जाए।
दुष्यंत कुमार और शरद जोशी जी का भोपाल और उसी की फिज़ाओं में उनकी शायरी ने धड़कना सीखा और धड़कन के रंग में रंग जाना भी।
मोहब्बत ,बशीर बद्र की ग़ज़ल की रूह है ।जज़्बातों की महीन, बेहद महीन कारीगरी। उनकी ग़ज़लों का रुमान अहा क्या ! वो कशिश, वो कसक, सादगी, गहराई और खूबसूरती है कि उनका हर चाहने वाला सोचता है यही तो है जो मैं कहना चाहता था ।
ज़िंदगी का फलसफा कदम दर कदम साथ चलता है और आत्मविश्वास का हिमालय तभी छुआ जाता है ,और तभी पाँवों को छूती हुई नदियाँ संगीत सुनाती हैं।हवाएं सुरीली हो उठती हैं।
“हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है!
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।।
दूसरी तरफ माशूक के लिए दिलेरी भी।
बेमिसाल दरियादिली या खुद को समझाने का सलीका।वे कहते हैं—
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता।।
उनके शेर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि कभी थे। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में वे पाकिस्तान नहीं गए। अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का घर साम्प्रदायिक दंगों में जला दिया गया, तो वे नवाबों के शहर भोपाल में आ बसे। तब उन्होंने लिखा–‘
“लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में।
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में।।”
समाज का बदलता हुआ रंग-रूप उन्हें टीस से भर देता है। वे हकीकत से जी नहीं चुराते, बल्कि हमें हिदायत देते हैं —
“कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से।
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।।”
यादों का काफिला हमेशा साथ चलता है, वह वक्त और मौसम का मोहताज नहीं, और उसी ने उनसे उर्दू शायरी का खजाना भर दिया।
भारी भरकम उर्दू फ़ारसी के शब्दों से भाराक्रांत ग़ज़ल को उन्होंने इतना सरल बना दिया कि वो हर जुबान पर चढ़ गई और अपना रस घोलती रही। पाठकों और शायरी के बीच की दूरी पूरी तरह ख़त्म हो गई।
वे कहते थे “भाषा तो एक माध्यम है, संस्कृत माँ तो उर्दू हिंदी बेटियाँ हैं।”
उन्हें भारत का “सांस्कृतिक राजदूत” कहा गया ।
वे जितने अपनेपन से आगाह करते हैं, जितना कोई करीबी भी नहीं करता कि–
“परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता ।
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता ।।”
कभी-कभी यकीन नहीं होता कि कोई इतना महीन भी लिख सकता है कि हृदय के सारे तार झनझना उठें और हम शब्दों को शब्द न समझकर अपने एहसास की तर्ज पर उन्हें अपने मन में समा लें —
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नजर को खबर न हो।
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर इसके बाद सहर न हो।।
कभी दिन की धूप में झूम के,कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी खत्म अपना सफर न हो।।
एक और बानगी पेश है कि
ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएंगे। रोएंगे बहुत लेकिन आंसू नहीं आएंगे।
कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं, दरिया की तरह तुझसे मिलने नहीं आएंगे।।
शब्दों की बाजीगरी और एहसासों की शिल्पी ग़ज़ल जो हर हृदय की धड़कन बन जाती है और देर तक रुनझुन करती रहती है। कभी बांसुरी की धुनें सुनाती हैं तो कभी अल्गोजे की। फिल्म “मसान” में उनकी शायरी इस्तेमाल की गई।
बशीर बद्र का निधन शायरी के स्वर्णिम अध्याय का एक भौतिक अवसान है। पर शायर तो रूहों पर राज करते हैं। चौदह वर्ष डिमेंशिया के शिकार रहे इक्यानवे वर्षीय बद्र आज हमारे बीच नहीं हैं पर ये भी कोई बात हुई? अपनी ग़ज़लों की देह में वे प्राण बनकर धड़कते रहेंगे—
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






