श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🌿अपने ही शरीर में अजनबी 🌷
🍂एक हृदय, एक अस्पताल और मनुष्य के अकेलेपन की कहानी..
उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन ऐसा आएगा, जब वह अपने ही शरीर में एक अजनबी की तरह पड़ा होगा। अपने ही हाथ-पैर उसे पराये लगेंगे, अपनी ही साँसों पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा और अपने ही जीवन के बारे में उसे दूसरों से समाचार मिलने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
जीवन भर दूसरों की चिन्ता करने वाला, अपने परिवार के लिए हर सम्भव व्यवस्था करके निश्चिन्त होने वाला वह आदमी, एक दिन स्वयं एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा, जिसके संचालन में उसकी इच्छा का कोई विशेष महत्त्व नहीं होगा।
लेकिन यह उस दिन की बात है, जब वह अस्पताल से लौटकर अपने घर में था। अभी कुछ समय पहले तक यह सब उसकी कल्पना से भी बाहर था।
उस समय तक वह अपने को एक स्वस्थ, सक्रिय और लगभग अजेय मनुष्य मानता था।
उम्र पचहत्तर के आसपास पहुँच गई थी, लेकिन उम्र को उसने कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया था। सुबह की लम्बी सैर, शाम को फिर निकल पड़ना, परिचित रास्तों पर चलते हुए लोगों को नमस्कार करना, पेड़ों को देखते रहना और लौटकर अपनी इच्छानुसार खाना-पीना—जीवन अपनी सामान्य लय में बह रहा था।
उसने उम्र के साथ आने वाली कुछ छोटी-मोटी असुविधाओं को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया था। कभी थकान हुई भी तो सोचा, आज शायद नींद पूरी नहीं हुई। कभी चलते हुए थोड़ा सुस्त पड़ा तो लगा, उम्र का तकाजा है। शरीर आखिर मशीन तो नहीं कि पचहत्तर वर्ष तक चलने के बाद भी उसी गति से दौड़ता रहे।
उसे अपने हृदय पर भरोसा था।
यह भरोसा किसी चिकित्सकीय जाँच पर आधारित नहीं था। यह उस सहज विश्वास का हिस्सा था, जिसके सहारे मनुष्य सुबह उठता है, दिन भर के काम करता है और रात को सोते समय अगले दिन की योजनाएँ बनाता है। हम अपने शरीर को तब तक अपना सबसे विश्वसनीय साथी मानते हैं, जब तक वह अचानक हमें किसी दूसरी भाषा में कुछ बताने न लगे।
पिछले कुछ समय से उसे थकान महसूस होने लगी थी। पहले उसने उसे अनदेखा किया, फिर कुछ दिनों तक उस पर ध्यान दिया और अन्ततः डॉक्टर के पास जाने का निश्चय किया।
डॉक्टर ने कुछ जाँचें लिख दीं।
जाँचें हुईं। रिपोर्टें आईं। फिर कुछ और जाँचें हुईं।
इसके बाद डॉक्टर ने जो बताया, उसने उसकी अब तक की सारी धारणाओं को एक ही झटके में हिला दिया।
हृदय की धमनियों में काफी अवरोध था। बाईपास सर्जरी आवश्यक थी।
कुछ क्षणों तक वह डॉक्टर का चेहरा देखता रहा। उसे लगा, शायद बात ठीक से समझ नहीं आई है। डॉक्टर किसी दूसरे मरीज की रिपोर्ट की चर्चा कर रहा होगा। अथवा रिपोर्ट में कोई भूल हुई होगी।
🍃बाईपास सर्जरी!
यह शब्द उसके लिए किसी परिचित चिकित्सा-प्रक्रिया का नाम नहीं था। यह एक ऐसी घटना का नाम था, जो दूसरों के जीवन में घटित होती है। अखबारों में, मित्रों की बातचीत में, किसी परिचित के परिवार में। वह स्वयं उसके दायरे में कैसे आ सकता था?
वह तो ठीक-ठाक था। चलता-फिरता था। अपना काम स्वयं करता था।
फिर यह सब कैसे?
मनुष्य को अपने बारे में कुछ धारणाएँ बनाने की आदत होती है। वह स्वयं को एक निश्चित उम्र का, एक निश्चित स्वास्थ्य वाला और एक निश्चित भविष्य की ओर बढ़ता हुआ व्यक्ति मानकर चलता है। उसे विश्वास रहता है कि जीवन में परिवर्तन तो होंगे, लेकिन धीरे-धीरे; एक-एक करके; इतनी मोहलत देते हुए कि वह स्वयं को उनके अनुकूल ढाल सके।
जीवन ने इस बार उसे कोई मोहलत नहीं दी थी।
एक ही दिन में वह स्वस्थ व्यक्ति से हृदय-रोगी बन गया था। कल तक जिस शरीर को वह अपनी इच्छाओं का आज्ञाकारी सेवक समझता था, आज उसी के बारे में निर्णय विशेषज्ञों को लेना था।
उसके मन में एक साथ कई भाव उठे।
भय था, लेकिन वह मृत्यु का स्पष्ट भय नहीं था। वह उस अनजाने रास्ते का भय था, जिसका अगला मोड़ दिखाई नहीं देता। अविश्वास था, क्योंकि जो कुछ बताया जा रहा था, वह उसकी अपनी अनुभूति से मेल नहीं खाता था। विवशता थी, क्योंकि वह न तो बीमारी को नकार सकता था, न ही उपचार की आवश्यकता को।
और कहीं भीतर एक छोटा-सा प्रश्न लगातार सिर उठा रहा था—क्या सचमुच यह सब मेरे साथ हो रहा है?
एक बात उसे राहत देती थी। उसे दिल का दौरा नहीं पड़ा था। बीमारी का पता समय रहते चल गया था और शहर में अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध थीं। अनुभवी डॉक्टर थे, आधुनिक उपकरण थे और अस्पताल में उपचार की आवश्यक व्यवस्थाएँ थीं। आर्थिक पक्ष की भी कोई विशेष चिन्ता नहीं थी; खर्च कम्पनी की व्यवस्था के अन्तर्गत आना था।
बाहरी परिस्थितियों में लगभग सब कुछ अनुकूल था।
लेकिन मनुष्य की एक विचित्र समस्या है। बाहर की सारी सुविधाएँ जुट जाने के बाद भी भीतर का भय अपनी जगह बना रहता है। कभी-कभी तो सुविधाओं की उपलब्धता भय को और स्पष्ट कर देती है, क्योंकि तब मनुष्य के पास अपनी असहायता को परिस्थितियों के सिर मढ़ देने का बहाना भी नहीं बचता।
उसके सामने उपचार का रास्ता था। उसे उस पर चलना ही था।
और फिर अस्पताल का वह संसार शुरू हुआ, जिसमें प्रवेश करते ही समय का अर्थ बदल जाता है।
🍂खुला आकाश और आईसीयू
अस्पताल पहुँचने तक उसे विश्वास था कि वह शीघ्र ही वापस अपने सामान्य जीवन में लौट आएगा। कुछ दिन की बात होगी। डॉक्टर उपचार करेंगे, वह स्वस्थ होगा और फिर अपनी सैर पर निकल पड़ेगा।
लेकिन अस्पताल में समय घड़ी की सुइयों से नहीं, घटनाओं से मापा जाता था।
कभी रक्तचाप की जाँच, कभी रक्त के नमूने, कभी दवाइयाँ, कभी डॉक्टरों का आना। बीच-बीच में नर्सें आतीं, कुछ पूछतीं, कुछ करतीं और आगे बढ़ जातीं। हर व्यक्ति के पास कोई निश्चित काम था। सब कुछ एक सुव्यवस्थित क्रम में हो रहा था।
केवल वह था, जिसके लिए उस क्रम का कोई अर्थ नहीं बन पा रहा था।
आईसीयू में पहुँचने पर उसे पहली बार लगा कि वह सचमुच अपने परिचित संसार से बहुत दूर आ गया है।
खुला आकाश, पेड़ों की हरियाली, सुबह की धूप, शाम की हवा—ये सब अब किसी दूसरी दुनिया की वस्तुएँ थीं। यहाँ छत थी, रोशनी थी, मशीनें थीं, और उनके बीच एक ऐसी आवाजाही थी, जिसमें किसी की व्यस्तता कभी समाप्त होती दिखाई नहीं देती थी।
मशीनें अपनी भाषा में बोलती थीं। कभी कोई हल्की-सी ध्वनि, कभी कोई संकेत। नर्सें आतीं, स्क्रीन देखतीं, उसके शरीर की जाँच करतीं और फिर अपने काम में लग जातीं।
उसके शरीर से नलियाँ जुड़ी थीं। हाथ में सुई लगी थी। दवाइयाँ दी जा रही थीं। हर थोड़ी देर में कोई न कोई उसके पास आता।
उसने पहले कभी अपने शरीर को इस तरह नहीं देखा था।
शरीर, जो जीवन भर उसके लिए इतना सहज था कि उसे उसके होने का अहसास तक नहीं होता था, अब एक ऐसी वस्तु बन गया था, जिसकी हर छोटी गतिविधि पर निगरानी रखी जा रही थी।
वह करवट बदलना चाहता तो उसे सहायता चाहिए थी। कुछ पूछना चाहता तो किसी के आने की प्रतीक्षा करनी पड़ती। उसे यह भी नहीं मालूम था कि अगले कुछ घंटों में उसके साथ क्या होने वाला है।
जीवन भर अपने निर्णय स्वयं लेने वाला आदमी अचानक दूसरों के निर्णयों पर निर्भर हो गया था।
उसे बताया गया कि सर्जरी होगी।
उसने सुना। सिर हिलाया। आवश्यक कागजों पर हस्ताक्षर हुए। परिवार के सदस्य डॉक्टरों से बात करते रहे। कभी कोई रिपोर्ट देखता, कभी कोई फोन पर किसी से चर्चा करता। सब कुछ आगे बढ़ रहा था।
लेकिन उसके भीतर जैसे कुछ ठहर गया था।
वह चाहता था कि कोई उसके पास बैठकर उससे बात करे। उपचार की तकनीकी जानकारी से अलग, कुछ ऐसी बातें करे जिनका सम्बन्ध उस मनुष्य से हो, जो इस बिस्तर पर लेटा हुआ है। कोई पूछे कि वह क्या सोच रहा है, उसे किस बात से डर लग रहा है, उसे किसकी याद आ रही है।
पर शायद ऐसी बातें पूछने का समय किसी के पास नहीं था।
डॉक्टरों के पास चिकित्सा का उत्तरदायित्व था। नर्सों के पास अपनी ड्यूटी। परिवार के पास व्यवस्थाएँ सँभालने और उसे स्वस्थ देखने की बेचैनी।
हर व्यक्ति अपनी जगह उचित काम कर रहा था।
फिर भी, इन सबके बीच एक ऐसा खाली स्थान था, जहाँ केवल वही उपस्थित था—अपने भय के साथ, अपनी आशंकाओं के साथ।
उसने सोचा, कैसी विचित्र बात है!
जिस परिवार के लिए उसने जीवन भर कितनी ही व्यवस्थाएँ की थीं, आज वही परिवार उसके लिए सब कुछ कर रहा था। कोई उसके लिए दौड़ रहा था, कोई डॉक्टर से बात कर रहा था, कोई दवाइयों का हिसाब देख रहा था, कोई उसकी स्थिति जानने के लिए बार-बार आ रहा था।
वह उनके प्रेम को देख सकता था। उनके चेहरे पर चिन्ता भी पढ़ सकता था।
लेकिन उस प्रेम के बीच भी उसे अपने भीतर उतरने के लिए अकेला ही रहना था।
क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जिनमें लोग आपके साथ चल तो सकते हैं, लेकिन आपके स्थान पर एक कदम भी नहीं रख सकते।
सर्जरी की प्रतीक्षा में उसे पहली बार अपने समर्पण की सीमा का पता चला।
वह जानता था कि उसे डॉक्टरों पर भरोसा करना होगा। वह यह भी समझता था कि चिकित्सा की आवश्यकता के सामने उसकी व्यक्तिगत इच्छाओं का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। लेकिन समझ लेना और भीतर से स्वीकार कर लेना दो अलग-अलग बातें थीं।
उसका मन बार-बार प्रतिरोध करता।
मेरे साथ ही क्यों? अभी तो मैं ठीक था। क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं है? क्या यह सब टल नहीं सकता?
फिर वह स्वयं को समझाता।
जब विशेषज्ञ यही कह रहे हैं, तो यही उचित होगा।
इसके बाद एक और विचार आता।
लेकिन जो कुछ होने जा रहा है, उसका परिणाम कौन जानता है?
मनुष्य का विवेक कभी-कभी उसे सही रास्ता दिखा देता है, पर भय उस रास्ते पर चलने के लिए तैयार नहीं होता।
उस रात वह इसी असमंजस में था।
🍂ऑपरेशन थिएटर के उस पार
सर्जरी के दिन अस्पताल का वातावरण पहले से अधिक तनावपूर्ण लग रहा था।
शायद वातावरण में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। वही डॉक्टर, वही नर्सें, वही आवाजाही। परिवर्तन उसके भीतर था। अब जो कुछ होने जा रहा था, वह केवल जाँच या दवाइयों तक सीमित नहीं था।
उसका शरीर शल्यचिकित्सकों के हाथों में जाने वाला था।
उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया।
इसके बाद की स्मृतियाँ स्पष्ट नहीं थीं।
कुछ चेहरे। कुछ आवाजें। कुछ निर्देश। फिर धीरे-धीरे चेतना का धुँधलका।
और उसके बाद एक लम्बा, अनजान अन्तराल।
उस अन्तराल में क्या हुआ, उसे मालूम नहीं था। समय बीता या नहीं, इसका भी कोई अनुभव नहीं था। कोई स्वप्न आया या नहीं, कोई विचार उठा या नहीं—सब कुछ जैसे किसी अदृश्य पर्दे के पीछे चला गया था।
जब चेतना ने फिर से लौटना शुरू किया, तो वह अपने परिचित संसार में नहीं था।
उसने आँखें खोलने की कोशिश की।
रोशनी थी। आसपास कुछ हलचल थी। शरीर भारी था। मुँह सूखा हुआ था। उसे समझने में कुछ समय लगा कि वह कहाँ है।
🌟आईसीयू।
फिर धीरे-धीरे उसे याद आया—सर्जरी।
क्या हो गया? क्या सब ठीक रहा?
वह पूछना चाहता था, लेकिन शब्दों को बाहर आने में कठिनाई हो रही थी।
किसी ने उसके पास आकर कुछ कहा। शायद उसे आश्वस्त किया कि ऑपरेशन हो गया है। उसे बताया गया कि अब वह निगरानी में है।
लेकिन आश्वासन सुनने के लिए भी मन का एकाग्र होना आवश्यक होता है। उसका मन तो अपने शरीर में लौटने की कोशिश कर रहा था।
फिर उसे दर्द का अनुभव हुआ।
एक ऐसा दर्द, जिसकी तीव्रता का अनुमान उसने पहले कभी नहीं लगाया था। छाती में खिंचाव, शरीर में भारीपन, हिलने-डुलने में असमर्थता। हर साँस के साथ अपने शरीर की उपस्थिति का नया अहसास।
वह समझ नहीं पा रहा था कि किस ओर ध्यान दे। दर्द पर, मशीनों की आवाजों पर, अपने शरीर से जुड़ी नलियों पर या इस प्रश्न पर कि आखिर उसके साथ हुआ क्या है।
उसने जीवन में अनेक कठिनाइयाँ देखी थीं। कामकाज के दबाव, पारिवारिक उत्तरदायित्व, आर्थिक निर्णय, अनिश्चित परिस्थितियाँ। उन सबमें वह कुछ न कुछ कर सकता था। सोच सकता था, सलाह ले सकता था, कोई निर्णय कर सकता था।
यहाँ वह कुछ भी नहीं कर सकता था।
उसे केवल पड़े रहना था।
कभी-कभी मनुष्य की सबसे बड़ी विवशता यही होती है कि वह अपनी विवशता को भी बदल नहीं सकता।
वह अपने शरीर से कहना चाहता था—थोड़ा सँभल जाओ। दर्द कम कर दो। मुझे सामान्य होने दो।
लेकिन शरीर अपनी गति से ठीक हो रहा था। उसे न उसकी अधीरता की परवाह थी, न उसके आग्रह की।
शायद जीवन में पहली बार उसे यह समझ में आने लगा था कि शरीर हमारा है, लेकिन हर समय हमारे आदेश पर नहीं चलता।
🍂प्रतीक्षा के दिन
उसे बताया गया था कि कुछ समय बाद निजी वार्ड में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।
उसने इस सूचना को राहत की तरह ग्रहण किया। उसे लगा कि अब सबसे कठिन समय बीत गया है। आईसीयू से बाहर जाना मानो जीवन में लौटने की पहली सीढ़ी होगी।
लेकिन वह दिन आया और टल गया।
फिर अगले दिन की बात हुई।
वह भी टल गया।
चिकित्सा में सुधार की गति हमेशा रोगी की इच्छा के अनुरूप नहीं होती। कभी शरीर को अधिक समय चाहिए होता है, कभी चिकित्सकों को कुछ और निगरानी आवश्यक लगती है। बाहर से देखने वाले को यह केवल एक विलम्ब लगता है; भीतर पड़े व्यक्ति के लिए यह विलम्ब एक अनिश्चित भविष्य का रूप ले सकता है।
वह बार-बार सोचता, आखिर कब तक?
कब वह अपने बिस्तर से उठ सकेगा? कब अपने पैरों पर खड़ा होगा? कब सामान्य भोजन कर पाएगा? कब उसे यह अनुभव होगा कि वह केवल एक मरीज नहीं, बल्कि फिर से एक स्वतंत्र मनुष्य है?
इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर नहीं था।
उसके परिवार के लोग आते, हाल पूछते, डॉक्टरों से बात करते और उसे ढाढ़स बँधाते। उनके चेहरे पर मुस्कराहट लाने की कोशिश होती, लेकिन आँखों में छिपी चिन्ता से वह अनजान नहीं था।
परिवार के सदस्यों के लिए भी यह आसान नहीं था।
वे उसे स्वस्थ, सक्रिय और आत्मनिर्भर देखने के अभ्यस्त थे। अब उसी व्यक्ति को एक बिस्तर पर असहाय पड़े देखना उनके लिए भी एक नया अनुभव था। वे उसकी मदद करना चाहते थे, उसे प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन स्वयं नहीं जानते थे कि कितनी आशा व्यक्त करना उचित होगा और कितनी चिन्ता छिपाना।
इसलिए वे अक्सर वही कहते, जो ऐसी परिस्थितियों में कहा जाता है—
“अब पहले से बेहतर हैं।”
“बस, थोड़ा समय और लगेगा।”
“डॉक्टर कह रहे हैं कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”
इन वाक्यों में प्रेम था। उम्मीद थी। कभी-कभी अपनी घबराहट को छिपाने की कोशिश भी।
वह उनकी बात सुनता और चुप रहता।
उसे मालूम था कि वे उसे परेशान नहीं करना चाहते। वह उन्हें और चिन्तित नहीं करना चाहता था। इसलिए अपने मन की सारी बातें उनके सामने नहीं रखता था।
वह दर्द की तीव्रता बता सकता था, लेकिन उस अजीब-सी बेचैनी को कैसे बताता, जिसका कोई नाम नहीं था?
वह कह सकता था कि भूख नहीं लग रही, लेकिन यह कैसे समझाता कि भोजन में रुचि खोने के साथ-साथ जीवन की सामान्य चीजों में भी उसकी रुचि कुछ समय के लिए जैसे कहीं खो गई थी?
उसे कई दिनों तक तरल आहार दिया गया। शरीर कमजोर था। उठने-बैठने में सहायता चाहिए थी। कभी बिस्तर के किनारे बैठना भी एक उपलब्धि लगता। अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में उसे अपने शरीर का नया परिचय मिलता।
जो काम पहले सहज थे, वे अब कठिन अभ्यास बन गए थे।
चलना, बैठना, उठना, कुछ निगलना, थोड़ी देर जागते रहना—हर छोटी गतिविधि के लिए ऊर्जा और धैर्य चाहिए था।
उसे लगा कि वह अपने जीवन की प्राथमिक कक्षाओं में वापस आ गया है।
लेकिन इस बार शिक्षक कोई और नहीं, उसका अपना शरीर था।
और इस शिक्षक के पास जल्दी करने वालों के लिए कोई विशेष छूट नहीं थी।
अस्पताल में दिन एक-दूसरे में घुलते जा रहे थे। सुबह होती, दवाइयाँ आतीं, जाँच होती, डॉक्टर देखते, कुछ निर्देश मिलते। दोपहर गुजरती। शाम होती। रात आती।
फिर वही क्रम।
उसे कभी-कभी लगता कि अस्पताल के इस संसार में सभी लोग जानते हैं कि उन्हें क्या करना है—सिवाय उसके।
डॉक्टर को उपचार करना है। नर्स को दवा देनी है। परिवार को देखभाल करनी है। किसी को रिपोर्ट लानी है, किसी को फोन करना है।
और उसे?
उसे ठीक होना है।
यह सुनने में जितना सरल था, अनुभव में उतना ही कठिन।
🍂दुनिया चलती रही
अस्पताल में पड़े-पड़े उसे बाहर की दुनिया के बारे में जानकारी परिवार के लोगों से मिलती थी।
कोई फोन करके उसका हाल पूछ रहा था। कोई मिलने आना चाहता था। कोई मित्र अपनी शुभकामनाएँ भेज रहा था। किसी ने कहा था कि स्वस्थ होते ही बात करेंगे। किसी ने उसके लिए प्रार्थना की थी।
परिवार के सदस्य ये सारी बातें उसे बताते रहते।
“आज फलाँ का फोन आया था।”
“आपके एक मित्र ने बहुत चिन्ता जताई।”
“कई लोग आपका हाल पूछ रहे हैं।”
वह सुनता और कभी-कभी सिर हिला देता।
इन समाचारों से उसे अच्छा लगता था। उसे यह जानकर सन्तोष होता कि लोग उसे याद कर रहे हैं। वह उनके स्नेह के लिए आभारी था।
फिर भी, उसके भीतर एक अजीब-सी अनुभूति जन्म लेने लगी थी।
दुनिया चल रही थी।
उसके मित्र अपने काम पर जा रहे थे। लोग बाजार जा रहे थे। सुबह की सैर हो रही थी। शाम को चाय की मेज पर चर्चाएँ हो रही थीं। मोबाइल फोन पर संदेश आ-जा रहे थे। किसी घर में हँसी गूँज रही थी, किसी कार्यालय में बैठक चल रही थी। मौसम बदल रहा था। सूरज निकल रहा था और डूब रहा था।
जीवन अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ रहा था।
केवल वह उससे कट गया था।
उसके पास न फोन था, न व्हाट्सऐप की दुनिया। या कहें कि उस समय उसके पास उस दुनिया तक पहुँचने की सामर्थ्य और इच्छा, दोनों सीमित हो गई थीं। जिन माध्यमों से वह प्रतिदिन मित्रों से जुड़ा रहता था, वे अब उसके लिए दूर की वस्तुएँ बन गए थे।
पहले दिन उसे इस बात का विशेष अनुभव नहीं हुआ। फिर धीरे-धीरे उसे लगा कि उसके जीवन का एक हिस्सा जैसे स्थगित हो गया है।
फोन पर आने वाले संदेशों का उत्तर देना, किसी परिचित को जवाब देना, किसी विषय पर अपनी राय व्यक्त करना, किसी समाचार पर प्रतिक्रिया देना—ये सब छोटे-छोटे काम थे। इतने छोटे कि सामान्य दिनों में उनका महत्त्व शायद ही कभी महसूस होता था।
लेकिन जब वे सब छूट गए, तब उसे पता चला कि वे केवल काम नहीं थे।
वे दुनिया में उसकी उपस्थिति के संकेत थे।
उनके माध्यम से वह दूसरों के जीवन में शामिल रहता था। कोई उससे कुछ पूछता था, कोई अपनी बात कहता था, कोई उसकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करता था। इन छोटे-छोटे संवादों से उसके दिन में एक सामाजिक लय बनी रहती थी।
अब वह लय टूट गई थी।
वह दूसरों की बातचीत का विषय तो था, लेकिन उसका सक्रिय भागीदार नहीं।
लोग उसके बारे में बात कर रहे थे। उसके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे। उसके लिए चिन्तित थे।
लेकिन वह उनके संसार में उपस्थित नहीं हो पा रहा था।
यह अन्तर धीरे-धीरे उसके भीतर एक गहरी अनुभूति बनकर उतरने लगा।
मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध केवल अपने भीतर से नहीं होता। उसे यह भी चाहिए कि कोई उसे पुकारे, कोई उससे बात करे, कोई उसके विचार सुने, कोई उसकी उपस्थिति को महसूस करे।
हम अक्सर समझते हैं कि हम अकेले इसलिए होते हैं, क्योंकि हमारे आसपास कोई नहीं है।
लेकिन कभी-कभी लोग चारों ओर होते हैं, फिर भी अकेलापन बना रहता है।
क्योंकि साथ होना और किसी के भीतर तक पहुँच पाना दो अलग-अलग बातें हैं।
🍂एक जीवन के भीतर कई जीवन
समय बीतता गया।
शरीर धीरे-धीरे उपचार का उत्तर देने लगा। दर्द में कुछ कमी आई। कमजोरी बनी रही, लेकिन अब वह पहले जैसी असहाय स्थिति में नहीं था। कभी-कभी उसे थोड़ी देर बैठने दिया जाता। फिर कुछ कदम चलने की कोशिश होती।
हर छोटी प्रगति के साथ परिवार के चेहरों पर राहत की एक हल्की रेखा उभरती।
वह भी समझने लगा था कि स्वास्थ्य लौटना कोई एक घटना नहीं, बल्कि अनेक छोटी घटनाओं का क्रम है।
कोई सुबह ऐसी आती, जब पिछली सुबह की तुलना में थोड़ा अच्छा महसूस होता। कोई दोपहर ऐसी होती, जब कुछ देर तक दर्द की ओर ध्यान नहीं जाता। कोई क्षण ऐसा आता, जब वह स्वयं को पहले से अधिक सक्षम पाता।
और फिर कोई दूसरा क्षण आता, जब कमजोरी उसे फिर अपनी सीमा याद दिला देती।
जीवन की यही गति उसे अब पहले से अलग दिखाई देने लगी थी।
पहले वह समय को भविष्य की योजनाओं से मापता था। क्या करना है, कहाँ जाना है, किससे मिलना है, कौन-सा काम पूरा करना है।
अब समय को वह इस आधार पर मापने लगा था कि आज वह कितना चल पाया, कितनी देर बैठ सका, कितना सहज होकर साँस ले सका।
उसके जीवन का पैमाना बदल गया था।
और इस परिवर्तन के साथ उसका मन भी बदलने लगा था।
अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े वह अपने अतीत की ओर लौटता। कभी बचपन की कोई स्मृति उभर आती। कभी नौकरी के दिन याद आते। कभी परिवार के साथ बिताए क्षण। कभी किसी पुराने मित्र की हँसी कानों में गूँजती। कभी कोई ऐसी बात याद आती, जिसे वर्षों पहले वह भूल चुका था।
स्मृतियाँ भी विचित्र होती हैं। वे हमारी इच्छा से नहीं आतीं। जब हम उन्हें बुलाते हैं, तब कभी नहीं आतीं; जब हम किसी दूसरी बात में व्यस्त होते हैं, तब अचानक सामने आ खड़ी होती हैं।
अब तो उसके पास व्यस्त होने के लिए भी बहुत कम था।
इसलिए स्मृतियों को आने की पूरी छूट मिल गई थी।
कभी वह उन दिनों में लौट जाता, जब जीवन में बहुत-सी जिम्मेदारियाँ थीं। तब उसे लगता था कि काम समाप्त हो जाएँ, उत्तरदायित्व कम हो जाएँ, कुछ समय अपने लिए मिल जाए, तो कितना अच्छा हो।
अब समय ही समय था।
लेकिन समय का होना और उसका उपयोग कर पाना एक ही बात नहीं है।
उसे अपने पुराने दिनों की भागदौड़ याद आने लगी। वे दिन, जिनमें वह कभी थक जाता था, कभी झुँझला उठता था, कभी चाहता था कि कोई उसे कुछ देर अकेला छोड़ दे।
आज वह अकेला था।
और इस अकेलेपन में उसे उन दिनों की आवाजाही याद आ रही थी।
उसे लगा कि जीवन की सामान्य परेशानियाँ भी जीवन का हिस्सा होती हैं। जिन बातों से हम छुटकारा पाना चाहते हैं, वे कभी-कभी हमारी जीवंतता का प्रमाण होती हैं।
शायद हम जीवन की सहजता का मूल्य तभी समझते हैं, जब वह कुछ समय के लिए हमसे छिन जाती है।
एक दिन उसे यह भी महसूस हुआ कि उसने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा भविष्य की सुरक्षा में बिताया था।
परिवार के लिए प्रावधान, आर्थिक व्यवस्थाएँ, जिम्मेदारियों का निर्वाह, कठिन समय के लिए तैयारी—ये सब आवश्यक थे। उसने जो किया, ठीक किया। जीवन में विवेक का अपना महत्त्व है।
लेकिन अब बिस्तर पर पड़े हुए वह सोचता कि क्या जीवन को सुरक्षित बनाने की कोशिश में हम कभी-कभी उसके सहज आनन्द को पीछे छोड़ देते हैं?
कितनी बार उसने सुबह की सैर को केवल व्यायाम समझकर जल्दी-जल्दी पूरा किया होगा। कितनी बार किसी पेड़ के नीचे बैठने के बजाय आगे बढ़ जाना उचित समझा होगा। कितनी बार किसी मित्र की बात सुनते हुए मन ही मन किसी दूसरे काम की योजना बनाई होगी।
अब उसे उन छोटी बातों का स्मरण हो रहा था, जिनका कोई विशेष महत्त्व उस समय नहीं था।
सुबह की हवा।
धूप का बदलता रंग।
रास्ते में मिलने वाले परिचित चेहरे।
चाय की मेज पर अनायास शुरू हो जाने वाली बातचीत।
अपने हाथों से कोई छोटा-सा काम कर लेने की स्वतंत्रता।
कितनी साधारण चीजें थीं।
और कितनी असाधारण!
उसने पहली बार गहराई से महसूस किया कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा उन अनुभवों से बना होता है, जिन्हें हम अनुभव करते समय महत्त्व नहीं देते।
हम उनका आनन्द लेने के बजाय उनके बीच से गुजरते रहते हैं।
और फिर एक दिन, जब हम उनसे दूर हो जाते हैं, तो वही साधारण अनुभव हमारी स्मृतियों में असाधारण चमक के साथ लौटते हैं।
🍃घर वापसी
अन्ततः वह दिन भी आया, जब अस्पताल से घर जाने की बात निश्चित हुई।
यह समाचार सुनकर उसे राहत मिली। अस्पताल के वातावरण से बाहर निकलने की इच्छा बहुत दिनों से थी। वह अपने बिस्तर, अपने कमरे, अपनी परिचित वस्तुओं और अपने घर की शान्ति में लौटना चाहता था।
स्टिचेज हटाई जा चुकी थीं। उपचार आगे भी चलना था, सावधानियाँ रखनी थीं और शरीर को पर्याप्त समय देना था। फिर भी, अस्पताल से घर जाना अपने आप में एक उपलब्धि थी।
जब वह घर पहुँचा, तो परिचित कमरा देखकर उसके भीतर एक अजीब-सी भावना उठी।
सब कुछ वैसा ही था।
वही दीवारें, वही फर्नीचर, वही खिड़की, वही परिचित वस्तुएँ। घर में उसके लौटने की खुशी थी। परिवार के लोग उसकी सुविधा का ध्यान रख रहे थे। सब चाहते थे कि वह आराम करे और शीघ्र स्वस्थ हो।
लेकिन वह स्वयं वैसा नहीं था।
घर लौटने का अर्थ था अपने संसार में लौटना, पर उसे लगा कि वह अपने ही संसार में किसी दूसरे रास्ते से आया है।
कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए उसे खुला आकाश दिखाई दिया। पेड़ दिखाई दिए। दूर कहीं किसी पक्षी की आवाज आई।
वह सब कुछ देख सकता था, लेकिन अभी वहाँ तक जा नहीं सकता था।
शरीर की सीमाएँ उसके साथ घर तक आ गई थीं।
चलने-फिरने में सावधानी आवश्यक थी। थकान जल्दी हो जाती थी। दिनचर्या बदल गई थी। भोजन, विश्राम, दवाइयाँ और चिकित्सकीय निर्देश—सब कुछ अब एक नए अनुशासन के अन्तर्गत था।
उसे यह स्वीकार करना पड़ा कि घर लौट आना और पूरी तरह स्वस्थ हो जाना दो अलग-अलग अवस्थाएँ हैं।
पर अस्पताल की तुलना में घर में एक सुविधा थी। यहाँ वह अपने समय का कुछ हिस्सा स्वयं चुन सकता था। यहाँ की चुप्पी में अस्पताल जैसी अपरिचितता नहीं थी। यहाँ हर वस्तु के साथ कोई न कोई स्मृति जुड़ी हुई थी।
फिर भी, एकान्त की एक नई परत उसके जीवन में उतर आई थी।
परिवार के सदस्य अपने-अपने कामों में लग जाते। कोई आवश्यक काम से बाहर जाता, कोई घर की व्यवस्था देखता, कोई फोन पर व्यस्त होता। वे बीच-बीच में उसके पास आते, हाल पूछते, कुछ देर बैठते और फिर अपने काम में लौट जाते।
वे गलत नहीं थे।
जीवन को रुककर नहीं चलाया जा सकता। परिवार की देखभाल के लिए भी रोजमर्रा के काम आवश्यक थे। और उसे भी यह अच्छा नहीं लगता कि सब लोग हर समय उसी के इर्द-गिर्द रहें।
लेकिन जब सब अपने काम में लग जाते, तो उसके पास बहुत सारा समय बच जाता।
पहले यही समय उसके लिए उपलब्ध नहीं होता था।
अब यही समय कभी-कभी असहनीय रूप से लम्बा हो जाता।
वह खिड़की से बाहर देखता। फिर कमरे में रखी वस्तुओं पर नजर डालता। कभी कोई पुस्तक उठाता, कुछ पन्ने पढ़ता और रख देता। कभी फोन की ओर देखता। कभी सोचता कि किसी मित्र से बात करे, फिर यह विचार करके रुक जाता कि अभी बातचीत करने की ऊर्जा है या नहीं।
उसने कभी कल्पना नहीं की थी कि स्वस्थ होने की प्रक्रिया में इतना एकान्त भी होगा।
लोगों ने बीमारी के बारे में बताया था। ऑपरेशन के बारे में बताया था। दर्द, दवाइयों, सावधानियों और आराम की आवश्यकता के बारे में भी बताया था।
लेकिन इस एकान्त के बारे में किसी ने नहीं बताया था।
शायद इसलिए कि इसे बताना कठिन है।
यह वह एकान्त नहीं था, जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से चुनता है। न वह एकान्त, जिसमें वह किसी पुस्तक के साथ बैठना चाहता है, न वह जिसमें ध्यान लगाना चाहता है, न वह जिसमें दुनिया की हलचल से कुछ देर दूर रहना चाहता है।
यह वह एकान्त था, जो जीवन की सामान्य गति से कुछ समय के लिए अलग हो जाने पर पैदा होता है।
जब दुनिया आगे बढ़ रही हो और आप अभी वहीं खड़े हों।
जब आपके अपने लोग आपके पास हों, लेकिन आप स्वयं अपनी अनुभूतियों को उनके सामने पूरी तरह व्यक्त न कर पा रहे हों।
जब आपको पता हो कि लोग आपसे प्रेम करते हैं, फिर भी आप उनसे कुछ ऐसी निकटता चाहते हों, जिसे केवल देखभाल से पूरा नहीं किया जा सकता।
उसे अपने परिवार के प्रेम पर कोई संदेह नहीं था।
उसे डॉक्टरों की दक्षता पर भी कोई शिकायत नहीं थी। अस्पताल में सबने अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। चिकित्सा के संसार में समय, अनुभव, अनुशासन और तकनीकी दक्षता का अपना महत्त्व है। वह इन बातों को समझता था।
फिर भी, उसके भीतर कुछ ऐसा था, जिसे न दवा ठीक कर सकती थी, न कोई चिकित्सकीय उपकरण माप सकता था।
उसे अपने पुराने जीवन की निकटता चाहिए थी।
वह चाहता था कि कोई उससे वैसे ही बात करे, जैसे पहले किया करता था। केवल उसकी सेहत पूछने के लिए नहीं, बल्कि किसी सामान्य विषय पर। कोई पुरानी बात छेड़ दे, किसी घटना पर हँस ले, कोई असहमति जता दे, किसी छोटी-सी बात पर उससे उलझ पड़े।
वह फिर से केवल एक मरीज नहीं, एक मनुष्य होना चाहता था।
एक ऐसा मनुष्य, जिसके विचारों का भी महत्त्व हो, जिसकी रुचियाँ हों, जिसकी हँसी हो, जिसकी अपनी दुनिया हो।
बीमारी ने उसके शरीर को कमजोर किया था, लेकिन उसके भीतर एक और परिवर्तन हुआ था। उसने अपनी उस पहचान को खोते हुए देखा था, जिसे वह इतने वर्षों से सहज रूप में जीता आया था।
वह आदमी, जो स्वयं निर्णय लेता था, अब दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करता था।
वह आदमी, जो दूसरों की समस्याओं के समाधान खोजता था, अब अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए किसी को पुकारता था।
वह आदमी, जो दूसरों को समय देता था, अब समय काटने की कोशिश करता था।
और यह सब उसे किसी क्षण अपमानजनक नहीं, बल्कि गहराई से मानवीय लगता।
क्योंकि शायद मनुष्य होने का अर्थ ही यह है कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर हम अपनी भूमिकाएँ बदलते रहते हैं।
कभी सहारा देते हैं, कभी सहारे की प्रतीक्षा करते हैं।
कभी किसी का हाथ पकड़ते हैं, कभी अपना हाथ आगे बढ़ाते हैं।
कभी किसी के लिए निर्णय लेते हैं, कभी अपने बारे में निर्णय दूसरों पर छोड़ देते हैं।
लेकिन इन भूमिकाओं के बदलने के बीच एक प्रश्न रह जाता है—क्या हम उस मनुष्य को देख पाते हैं, जो इन सबके भीतर है?
🍁जो बात वह कह नहीं पाया
घर लौटने के कुछ दिनों बाद एक शाम वह खिड़की के पास बैठा था।
बाहर धूप धीरे-धीरे ढल रही थी। पेड़ों की पत्तियों पर उसका रंग बदल रहा था। दिन का शोर कम होने लगा था। कहीं दूर से बच्चों के खेलने की आवाज आ रही थी।
उसे अपनी शाम की सैर याद आई।
कितनी सहज थी वह।
जूते पहने, बाहर निकले और चल पड़े। न कोई विशेष तैयारी, न कोई विचार। रास्ते में किसी से मुलाकात हो गई तो बात कर ली। किसी पेड़ पर फूल दिखाई दे गए तो कुछ क्षण रुक गए। थकान हुई तो गति धीमी कर ली।
उसे तब कहाँ पता था कि चलने की यह साधारण-सी स्वतंत्रता भी कितनी बड़ी सुविधा है!
उसने अपने पैरों की ओर देखा।
वे वहीं थे। शरीर का हिस्सा थे। धीरे-धीरे स्वस्थ भी हो रहे थे। चिकित्सकों के निर्देशों के अनुसार उसे चलना-फिरना फिर से बढ़ाना था।
लेकिन उस क्षण उसे अपने पैरों के बारे में सोचते हुए एक गहरी कृतज्ञता महसूस हुई।
जीवन में हम जिन चीजों को अपना अधिकार मान लेते हैं, वे वास्तव में हमारे पास उपलब्ध सुविधाएँ होती हैं। हम उनके लिए आभारी होना भूल जाते हैं, क्योंकि वे हमेशा हमारे साथ रहती हुई प्रतीत होती हैं।
चलना, साँस लेना, स्वयं भोजन करना, अपने कपड़े पहनना, बिना सहायता उठकर बैठ जाना—इन सबको हम उपलब्धि नहीं मानते।
ये तो बस जीवन है, ऐसा सोचते हैं।
लेकिन जब जीवन कुछ समय के लिए अपना सामान्य रूप खो देता है, तब हमें उसकी साधारण गतिविधियों में छिपी असाधारण कृपा दिखाई देने लगती है।
उसने सोचा कि वह फिर से चलेगा।
धीरे-धीरे सही, लेकिन चलेगा।
फिर सुबह की हवा में साँस लेगा। पेड़ों के बीच से गुजरेगा। परिचित रास्तों पर लोगों से मिलेगा।
यह विचार उसे अच्छा लगा।
लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा विचार भी आया।
जब वह वापस अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट जाएगा, तब क्या वह इन अनुभवों को याद रख पाएगा?
क्या वह फिर से जीवन की छोटी-छोटी सुविधाओं को अपना स्वाभाविक अधिकार मानने लगेगा? क्या वह फिर उन्हीं कामों में इतना व्यस्त हो जाएगा कि उस हवा को महसूस करना भूल जाएगा, जिसे पाने के लिए आज उसका मन बेचैन है?
मनुष्य की स्मृति का स्वभाव भी अजीब है। दुःख के समय वह सुख को याद करता है और सुख के समय दुःख को भूलने लगता है। कठिनाई में मिली सीख धीरे-धीरे सामान्य दिनों की धूल में ढक जाती है।
वह नहीं जानता था कि उसके साथ आगे क्या होगा। वह यह भी नहीं जानता था कि इस अनुभव ने उसके स्वभाव में कोई स्थायी परिवर्तन किया है या नहीं।
लेकिन इतना अवश्य था कि उस शाम उसे अपने जीवन के बारे में एक नई बात समझ में आई।
स्वस्थ होना केवल बीमारी से मुक्त होना नहीं है। कभी-कभी स्वस्थ होने का अर्थ अपने जीवन से फिर से सम्बन्ध स्थापित करना भी होता है।
अपने शरीर से, अपने लोगों से, अपनी स्मृतियों से और उन छोटी-छोटी चीजों से, जिनके बीच हम प्रतिदिन जीते हैं।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
शाम उतर रही थी।
दुनिया अपनी गति से आगे बढ़ रही थी।
और वह, बहुत दिनों बाद, उस दुनिया को केवल देख नहीं रहा था; उसे फिर से अपने भीतर अनुभव करने की कोशिश कर रहा था।
🤔अपने ही शरीर में अजनबी
बाईपास सर्जरी ने उसके हृदय की धमनियों में रक्त के प्रवाह के लिए नया रास्ता बनाया था। शरीर अपने ढंग से उपचार की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा था। उसे सावधानियाँ रखनी थीं, दवाइयाँ लेनी थीं, चिकित्सकीय परामर्श का पालन करना था और धैर्यपूर्वक अपनी शक्ति वापस प्राप्त करनी थी।
लेकिन उसके भीतर एक और रास्ता खुला था—एक ऐसा रास्ता, जिसका उल्लेख किसी रिपोर्ट में नहीं हो सकता था।
उस रास्ते से वह अपने जीवन को एक अलग दृष्टि से देख रहा था।
उसे अब समझ में आने लगा था कि मनुष्य का जीवन केवल उसके शरीर की धड़कनों से नहीं बना होता। वह उन सम्बन्धों से भी बना होता है, जिनमें उसकी धड़कनों का कोई अर्थ है। उन बातचीतों से, जिनमें उसका मन शामिल होता है। उन छोटी-छोटी स्वतंत्रताओं से, जिनके रहते वह अपने अस्तित्व को सहज मानता है।
बीमारी ने उसे मृत्यु के सामने खड़ा किया था या नहीं, वह इस बारे में कोई बड़ा दावा नहीं कर सकता था। न ही वह यह कह सकता था कि अस्पताल से लौटते ही उसे जीवन का कोई परम सत्य मिल गया था।
जीवन के बारे में बहुत कुछ समझ लेने का दावा करना आसान है। लेकिन कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को उत्तर देने के बजाय प्रश्नों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देते हैं।
उसके साथ शायद यही हुआ था।
अब वह जानता था कि मजबूत दिखाई देने वाला मनुष्य भी भीतर से कितना असुरक्षित हो सकता है। कि आर्थिक सुविधा और उत्कृष्ट चिकित्सा के बावजूद भय समाप्त नहीं होता। कि परिवार का प्रेम अमूल्य है, लेकिन किसी दूसरे के दर्द का अनुभव पूरी तरह साझा नहीं किया जा सकता। कि डॉक्टर शरीर का उपचार कर सकते हैं, पर मनुष्य को अपने भीतर चल रही यात्रा स्वयं करनी पड़ती है।
और यह भी कि अकेलापन हमेशा किसी के न होने से पैदा नहीं होता।
कभी-कभी वह तब जन्म लेता है, जब हम अपनी पुरानी पहचान से दूर हो जाते हैं और नई पहचान अभी हमारे भीतर आकार नहीं ले पाती।
वह अब भी वही व्यक्ति था।
वही स्मृतियाँ, वही सम्बन्ध, वही रुचियाँ, वही जीवन।
लेकिन वह पहले जैसा भी नहीं था।
उसने अपने शरीर को असहाय होते देखा था। अपनी स्वतंत्रता को सीमित होते देखा था। अपने प्रियजनों की आँखों में चिन्ता देखी थी। दुनिया को अपने बिना चलते हुए देखा था। और अपने भीतर उस एकान्त को महसूस किया था, जिसके बारे में उसने पहले कभी गम्भीरता से सोचा भी नहीं था।
शायद इसीलिए, घर लौट आने के बाद भी, कभी-कभी उसे लगता था कि वह अपने ही घर में अतिथि है।
अपने ही शरीर में अजनबी है।
अपने ही जीवन के किसी ऐसे अध्याय में प्रवेश कर चुका है, जिसकी भाषा उसे अभी सीखनी है।
वह जानता था कि समय के साथ बहुत कुछ सामान्य हो जाएगा। शरीर की शक्ति लौटेगी। दिनचर्या बनेगी। मित्रों से बातचीत होगी। फोन फिर बजेगा। जीवन फिर अपनी पुरानी लय में लौटने की कोशिश करेगा।
लेकिन क्या मनुष्य पूरी तरह उसी स्थान पर लौट सकता है, जहाँ से वह चला था?
शायद नहीं।
कुछ अनुभव हमारे भीतर एक छोटा-सा दरवाजा खोल देते हैं। उसके पार कोई नया संसार नहीं होता; वही पुराना संसार होता है, लेकिन उसे देखने वाली आँखें थोड़ी बदल जाती हैं।
अब वह जानता था कि किसी स्वस्थ व्यक्ति का सामान्य दिन भी एक अनमोल उपलब्धि हो सकता है।
कि किसी का हाल पूछना केवल शिष्टाचार नहीं, उसके संसार में प्रवेश करने का एक छोटा-सा प्रयास भी हो सकता है।
कि किसी की बीमारी के बारे में पूछते समय हम अक्सर उसके शरीर के बारे में पूछते हैं, जबकि उसके भीतर का मन भी किसी संवाद की प्रतीक्षा कर रहा हो सकता है।
और कि देखभाल केवल दवा देना, भोजन पहुँचाना या आवश्यक व्यवस्थाएँ कर देना नहीं है। कभी-कभी देखभाल का अर्थ किसी के पास बैठकर कुछ देर चुप रहना भी होता है। बिना यह आग्रह किए कि वह शीघ्र ठीक हो जाए, बिना उसे हिम्मत बँधाने के लिए कोई वाक्य खोजे, बिना उसकी पीड़ा को किसी सीख में बदलने की कोशिश किए।
बस उसके पास होना।
शायद यही वह उपस्थिति है, जिसकी आवश्यकता हमें जीवन के सबसे कठिन क्षणों में होती है।
उस शाम खिड़की के बाहर अँधेरा गहरा रहा था। कमरे में हल्की रोशनी थी। परिवार का कोई सदस्य पास के कमरे में था। घर की परिचित आवाजें सुनाई दे रही थीं।
वह चुपचाप बैठा रहा।
उसके भीतर कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं था। न कोई दार्शनिक उद्घोष, न जीवन के रहस्य को समझ लेने का दावा।
केवल एक सहज-सी इच्छा थी।
वह फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था।
फिर से चलना चाहता था।
फिर से अपने लोगों के बीच उसी सहजता से बैठना चाहता था, जैसे पहले बैठा करता था।
और शायद, जब अगली बार कोई मित्र उसे फोन करे, तो वह केवल उसका हाल पूछकर फोन न रख दे। वह कुछ देर उससे बात करे। किसी पुरानी बात पर हँसे। किसी सामान्य विषय पर बहस करे। जीवन की किसी छोटी-सी घटना पर अपनी राय दे।
वह फिर से उस दुनिया का हिस्सा बनना चाहता था, जिसमें लोग केवल उसकी बीमारी के कारण उसे याद न करें, बल्कि उसके होने के कारण उससे जुड़ें।
क्योंकि अन्ततः मनुष्य केवल जीवित नहीं रहना चाहता।
वह जीना चाहता है।
अपने ढंग से, अपने लोगों के साथ, अपने छोटे-छोटे सुखों के बीच।
और शायद जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम उसके इस साधारण-से अर्थ को तब समझते हैं, जब कुछ समय के लिए उससे दूर हो जाते हैं।
उसने धीरे से आँखें बन्द कीं।
अपने सीने पर हाथ रखा।
धड़कन चल रही थी।
उसने उसे सुना नहीं, लेकिन पहली बार बहुत गहराई से उसका होना महसूस किया।
फिर उसने आँखें खोलीं और खिड़की के बाहर देखा।
आकाश अब दिखाई नहीं दे रहा था। रात उतर चुकी थी।
लेकिन वह जानता था कि आकाश वहीं है।
और कहीं भीतर, बहुत धीरे-धीरे, उसे यह विश्वास भी लौटने लगा था कि एक दिन वह फिर उस खुले आकाश के नीचे चलेगा।
शायद पहले की तरह नहीं।
शायद थोड़ी धीमी गति से।
शायद रास्ते में अधिक बार रुककर।
लेकिन इस बार, उम्मीद थी, वह चलते हुए केवल रास्ता तय नहीं करेगा।
वह रास्ते को भी महसूस करेगा।
हवा को भी।
पेड़ों को भी।
अपने कदमों को भी।
और उस जीवन को भी, जो अब तक उसके साथ था, लेकिन जिसे उसने पहली बार इतनी गहराई से अपने भीतर महसूस किया था।
उसका हृदय फिर धड़क रहा था।❤️
लेकिन अब उसे यह भी समझ में आने लगा था कि मनुष्य को केवल धड़कनों की निरन्तरता नहीं चाहिए।
उसे अपने होने का अनुभव चाहिए।
और कभी-कभी, उस अनुभव तक पहुँचने के लिए, उसे अपने ही शरीर में अजनबी बनकर एक लम्बी यात्रा करनी पड़ती है।
© श्री जगत सिंह बिष्ट ✨
साधक
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≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈





