सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ स्वर्ण किरण के छूते ही… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
(हाइबुन)
हरसिंगार कहते ही सिन्दूरी वृन्त पर दूधिया कोमलांगी पाँखुरियाँ ही नहीं, भीनी भीनी महक का चित्र पल में बना लेती हैं आँखें।नेत्रों से झरने लगती है ओस।
समूची कायनात किरणों की प्रतीक्षा में घुप्प अंधेरों से जंग लड़ती है।प्रतीक्षा ही तो उत्स है उर्जा का।
पहली पहली स्वर्णकिरण,पहले पहले प्रेम पत्र सी जिसे मन जी भरकर देखना चाहे, छूना चाहे, एक अटूट भरोसे की आहट।जैसे ये किरण नहीं तरी है जो सारे दिन का दरिया पार कराएगी।
जिस उजाले की पहली रश्मिरेखा से जिन्दगी का फलसफा लिखा जाता है,आशा की परियां गुनगुन करने लगती हैं वही हरसिंगार से जिन्दगी छीन लेती है।जिन्दगी सिर्फ एक रात की।उफ़।जो हवा दीप जलाती है वही बुझा भी देती है।
एक रात का अतिथि हरसिंगार। भारतीय दर्शन सारा का सारा एक फूल से निवेदित होता है।जिन्दगी कितनी मिली इसके मानी ज्यादा नहीं, कैसे जी गई सारा तत्वदर्शन इसी में समाया है।रंगकोष लुटाकर,खुशबू उड़ेलकर।मकसद पूरा ऐसे होता है।फिर धरती को देह सौंप देती है प्रकृति।
अतिशय कोमल रूप की ऐसी परिणति !कोमलता भी ऐसी कि हल्का सा परस भी आहत कर जाए।
मिट्टी के अक्षय पात्र में सब कुछ एक रंग,एक रूप, एक प्राण हो जाता है।
कितनी ही अनिंद्य रूपराशि, पराकोटि की महक क्यों न हो सभी को मिट जाना है एक दिन।
समुद्र मंथन से निकला था हर सिंगार।मनोमंथन से भी यह अविष्कार संभव है।
मेरे देवतरु के फूल भी मेरे —- मेरा मेरा — कुछ नहीं होता। सारा निसर्ग का है।
दरअसल इस स्वर्गिक रूपराशि से आँखों को उनके होने का गर्व अनुभव करवाना होता है।
सत्यभामा के लिये स्वर्ग से लाये थे कृष्ण —- हरसिंगार। नियति — उसके फूल रुक्मिणी के आँगन में झरते थे।अपना अपना भाग्य।
हर फूल की नियति तै है। पूर्वलिखित है।
कंपाउंड वाॅल के बाहर की टहनियों से हरी हरी घास पर बारिश की बूँदों में लिपटे भीगे भीगे फूल, कार्पोरेशन के झाड़ूवाले बड़ी बेरहमी से डस्ट बिन में डाल देते हैं।कुछ उन्हें अनजाने में रौंदते हुये चलते हैं।
कुछ संवेदनशील मन के स्वामी, एक एक फूल हौले हौले चुनते हैं—-
माना कि तुम शाख से अलग हो चुके हो पर मन है कि मानता नहीं—निष्प्राण में प्राणों के स्पंदन सुनने की बेकली,कातर आशा— सब कुछ जानते हुये भी, निरीह मन को समझाने में नाकाम।
हरसिंगार के एक दिन का सफरनामा– तेरा तुझको अर्पण।।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






