श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ७१ ☆
☆ आलेख ☆ ~ हमारी संस्कृति- हमारे त्यौहार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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हमारा देश भारत विभिन्न संस्कृति और संस्कारो, रीति रिवाज का देश है। भारत की संस्कृति, संस्कार रीती- रिवाज ही हमारी शक्ति के आधार हैं। हमारा भारत उत्सवधर्मी देश है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत उत्सवों का देश है और ये उत्सव, हमें और अधिक ऊर्जान्वित करते हैं तथा और भी अधिक उत्साह कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। हमारी लोक संस्कृति, पूर्व से पश्चिम -उत्तर से दक्षिण तक लगभग एक सी है। बस इसको मनाये जाने वाली पद्धतियाँ विभिन्न है। अनेकता में एकता वाला अपना भारत अपने संस्कृति और संस्कारों से कभी समझौता नहीं करता। भारतीय, भारत में या भारत से सुदूर किसी अन्य देश में जब भी और जहाँ भी जाता है अपनी संस्कृतियों और अपने संस्कारों को साथ-साथ ले जाना नही भूलता है। उदाहरण के तौर पर यदि देखें तो आज से लगभग 200 से अधिक वर्षों पूर्व भारत से अन्य कैरेबियन गिरमिटिया देश में गए भारतीय मजदूर, स्वयं तो गए लेकिन अपनी संस्कृतियों को ले जाना नहीं भूले। इतना ही नहीं बल्कि वे जिन देशों में गए वहाँ उन्होंने आज तक अपनी इन संस्कृतियों को पूरी तरह से जीवित रखा है और आज भी वे अपने तीज – त्योहारों को उतने ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यह तो बात हुई कैरेबियन और गिरमिटिया देश के प्रवासियों की। यदि मैं बात करूँ उन प्रवासियों की जो कि व्यापार एवं शिक्षा के उद्देश्य से अन्य यूरोपीय देशों को गए। ये प्रवासी अत्यंत ही आधुनिक और मॉडर्न थे, इन सब के बावजूद इन्होंने भी अपने तीज त्यौहार, लोक परंपराओं को नहीं छोड़ा। अक्सर मैं जब यूट्यूब और वीडियो पर जाता हूँ तो मुझे अपनी लोक परंपराओं के वही दृश्य उन विदेशी धरती पर भी दिखाई देता है, जैसा अपने भारत में होता है। भारत से ऑस्ट्रेलिया पहुंची भारतीय मूल की क्रिएटर लवली सिंह के वीडियो में हमें भारतीय रीति रिवाज और त्योहारों की झलक ऑस्ट्रेलिया ठीक उसी तरह से देखने मिलती है जैसा कि भारत में होता है।
भारतीयों ने विदेश की धरती पर रहकर, जो साहित्य सृजन किया उसमें भी भारत पूरी तरह से जीवंत और जागृत है।
यदि हम अपने भारत की ही बात करें तो हमारे जितने भी राज्य हैं वहां भिन्न-भिन्न बोली – भाषा, जीवन शैली अवश्य है लेकिन हमारे त्योहार और रीति-रिवाज के मूल में जो एका है, ऐसा कहीं नहीं होता है। उत्साह से भरे इन त्योहारों की एक बानगी देखिए, होली, दिवाली, दशहरा, छठ पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, गणेश पूजा, ओड़म, बैशाखी जैसे त्योहार पूरे भारत में विभिन्न क्षेत्र में बनाए जाते हैं, यह सारे त्यौहार भारतीय संस्कृति और भारतीयों को एक सूत्र में बनते हैं।
यदि एक और त्यौहार विशेष बात करें, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हुए उत्तरायण होता है तो मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है। जिसे उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व कहते हैं। ठीक इसी समय यह त्यौहार विभिन्न राज्यों में विभिन्न नाम से मनाया जाता है जैसे पूर्वोत्तर में विहू, दक्षिण में पोंगल और पंजाब में लोहड़ी के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित एवं नव अन्न ( अनाज ) के साथ बनाए जाने वाले ऐसे त्यौहार बताते हैं कि भारतीय किस तरह से विभिन्न रीति रिवाज और परिधानों के साथ एकता के सूत्र में बंधे होते है। हमारी बोली भाषा -वर्तनी, लेखनी भिन्न अवश्य होती है लेकिन हमारे अंदर का हिंदुस्तान, जो सर्वे भवंतु सुखिनः एवं विश्व बंधुत्व की भावना से ओत -प्रोत है, मिलजुल कर रहना सीखता है। स्वयं की संस्कृतियों से अपने को जोड़कर दूसरी संस्कृतियों का भी सम्मान करना सिखता है। इसीलिए तो हमारा देश भारत, स्वयं में एक अनूठा देश है।
विभिन्न काल खण्डो में भारतीय संस्कृति कई बार ऐसे दौर से गुजरी जब इसको बड़ी वेदना और कष्ट सहने पड़े, लेकिन उन परिस्थितियों से भी यह नष्ट नही हुईं। हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार, हमारी लोक परंपराएं आज भी मजबूती के साथ खड़ी है और जीवंत है तथा विश्व को संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति वह सूर्य है जो कभी अस्त नही होता है।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





राजेश सिंह श्रेयस की कलम से उम्दा ही। श्री हेमंत बावनकर और उनकी टीम के सौज्न्य से अच्छा ही हिन्दी जगत में आ रहा है। मेरा भी अच्छा अवसर बन जाता है मॉरिशस की अपनी हिन्दी के साथ जुड़ जाता हूँ।