श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुख की उत्पत्ति…“।)
अभी अभी # ९९९ ⇒ आलेख – सुख की उत्पत्ति
श्री प्रदीप शर्मा
जिन्हें सिर्फ आम ही खाना पेड़ नहीं गिनना, उनके लिए तो यही बेहतर है कि वे सुख के उद्गम अथवा उत्पत्ति के बारे में अधिक मगजपच्ची ना करें, उनके लिए सुख की अनुभूति ही सब कुछ है। आम से हमको मतलब, गुठली से क्या लेना। रबड़ी कैसे बनती है, यह जानकर हमें क्या करना। कुछ लेना न देना, सिर्फ ऑन लाइन जोमेटो पर ऑर्डर प्लेस करना। कोई दूध खरीदे, महंगी गैस पर उसे गर्म करे, ओटाये, सुख की आस में पसीना बहाए। आजकल इंस्टेंट अर्थात् त्वरित सुख का जमाना है, सुख की खोज के लिए ज्ञानवर्धक किताबों में आजकल सर नहीं गड़ाया जाता, हमने सभी सुखों को अपने रिमोट में कंट्रोल कर लिया है फिर चाहे वह टीवी, पंखा, कूलर अथवा एयर कंडीशनर ही क्यों ना हो। हवा आने दो।
सुख भी आजकल स्विच ऑन और स्विच ऑफ होने लगा है। हमसे किसी का अधिक सुख भी नहीं देखा जाता। अधिक सुख की तो छोड़िए, जिसे निर्मल वर्मा एक टुकड़ा सुख कहते थे, उस पर भी आजकल वक्त की नज़र लग चुकी है। आज के एक आम आदमी के टुकड़े टुकड़े सुख वास्तव में क्या हैं, जिन पर नियति अपनी बुरी नज़र लगा रही है। आइए देखते हैं।।
सुख आसमान से नहीं टपकता। सुख की उत्पत्ति का मूल ही कष्ट है, पीड़ा है, संघर्ष है, एक तड़प है। प्यास के बिना पानी नहीं, भूख बिना भोजन नहीं। विरह बिन मिलन नहीं।
नदी का उद्गम पहाड़ है।
कितनी चट्टानों से टकराकर वह अपनी राह निकालती है। चंचल प्रवाह, और संघर्ष के बीच, अच्छे बुरे मौसम का सामना कर सबके सुख के लिए निरंतर बहते रहना, सबकी प्यास बुझाना ही तो नदी का स्वभाव है। सुख वही शाश्वत है, जिसका अंत अनंत सुखसागर में हो।
एक बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है, प्रकृति से लड़ना, जूझना, संघर्ष करना, बड़े होकर पंछी को छाया और फल देना, इसी में उसे सुख की अनुभूति होती है। कोई पेड़ पर फल तोड़ने के लिए पत्थर मारता है, वृक्ष फिर भी बदले में फल ही वापस करता है। हमारे और उसके मज़ा चखाने के अंदाज़ में बहुत अंतर है।।
नदियां ना पीएं कभी अपना जल।
वृक्ष ना खाएं कभी अपने फल।।
सुख है ही एक ऐसी वस्तु, जिसे लेने में भी सुख की अनुभूति होती है और देने में भी। लेकिन सुख का कोई पेड़ नहीं होता। थोड़ा कष्ट उठाया जाए, परिश्रम किया जाए, तब ही वास्तविक सुख का अहसास होता है। सुख और दुख विपरीत परिस्थितियों में एक दूसरे का साथ देते हैं। सर्दी में धूप से प्यार और गर्मी में ठंडी बयार। भूख में ही भोजन अमृत होता है।
आंखों में नींद हो, तब ही तो सोने का मज़ा है। रात भर करवटें बदलते रहने में काहे का सुख।
सुख एक मिट्टी के कच्चे घड़े की तरह है, इसे पकाना बहुत जरूरी है। अगर सुख के उद्गम में तप है, ताप है, तो मिट्टी होते हुए भी एक घड़ा कितने प्यासों की प्यास बुझा सकता है। इतनी तपन सहन करने के बाद ही उसमें शीतल जल समाता है। लकड़ी, लोहा, ईंट, सीमेंट, मिट मिटकर ही एक इमारत खड़ी करते हैं। सुख की नींव को बड़े जतन से सींचना, सहेजना पड़ता है।।
हमारी सुख की नींव में भी अगर त्याग है, तपस्या है, परिश्रम और संघर्ष है, तो हम उस वास्तविक सुख का अनुभव भी कर सकते हैं, जो सिर्फ लेने में ही नहीं, देने में भी है। सुख का मार्ग कभी एकांगी नहीं होता। सुख दुख हमेशा साथ चलते हैं।
सुख और दुख के छोटे छोटे बादल ही तो हैं हमारी आशाओं के आसमान में !
इसमें कहीं संतान सुख छुपा है तो कहीं सब्सिडी सुख। घटती बढ़ती पेंशन की तरह हम सुखी दुखी होते रहते हैं। बस एक जिजीविषा है जो हमारे सुख का भी उद्गम है और दुख का कारण भी। कौन नहीं बहना चाहता सुखसागर में, इसकी परवाह किए बगैर कि अनंत सुख क्या है। जो हाथ लग गया, वही वास्तविक सुख। फिर सुख के पीछे इतनी मगजमारी क्यों।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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