श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूटी कौड़ी और अभागा रुपया…“।)
अभी अभी # १००१ ⇒ आलेख – फूटी कौड़ी और अभागा रुपया
श्री प्रदीप शर्मा
क्या आप जानते हैं, कभी फूटी कौड़ी भी मुद्रा का ही एक छोटा सा भाग था और आज फल फूल रहा रुपया इतना अभागा है कि इसके भाग ही नहीं किए जा सकते। एक समय था, जब रूपये के भी भाग इतने बलवान थे कि उसके भाग किए जा सकते थे। कभी एक रुपए में सोलह आने होते थे और हर आने में चार पैसे के हिसाब से पूरे रुपए में चौंसठ पैसे हुआ करते थे रुपया, आना, पैसा! रुपया मतलब, आना पैसा।
रुपए से किसे प्यार नहीं!
फिर आया दशमलव का जमाना और भारत के एक रुपए की कीमत सौ नए पैसे हो गई। एक चमचमाता नया पैसा, जिस पर भारत के साथ ही लिखा होता, रुपए का सौंवा भाग। महाभारत के सौ कौरव की तरह भारत के इस रुपए के सौ नए पैसे मुद्रा बाजार में खनखनाते फिरते थे। एक नया पैसा, दो नया पैसा, तीन नया पैसा, पांच नया पैसा, दस नया पैसा, बीस नया पैसा, और हां पच्चीस पैसे की चवन्नी और पचास पैसे की अठन्नी और इन सबसे बड़ा रुपया। क्या ठाठ थे उन दिनों रूपयों पैसों के।।
आज के डिजिटल युग में आप चाहें तो रूपयों से नहा लें, डिजिटल ट्रांसफर और paytm से कुबेर का खजाना खरीद लें, लेकिन माफ करें, आज आपकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं। क्योंकि आज की अधिकांश पीढ़ी ने तो कौड़ी का नाम भी नहीं सुना होगा। हां, अगर कभी मैगी और पिज्जा बर्गर से मन भर गया हो, तो बाजार में पकौड़ी जरूर खाई होगी।
आज बेशक, हमारे सर पर डिजिटल करेंसी का ताज है, लेकिन हम पाई पाई को मोहताज हैं। अब यह पाई कौन सी बीमारी है भाई। ज्यादा दूर ना जाएं। बस इस कहावत पर गौर फरमाएं। चमड़ी जाए, पर दमड़ी ना जाए। बस यह दमड़ी ही पाई की नानी है। इनकी भी बड़ी विचित्र कहानी है ;
फूटी कौड़ी से कौड़ी, कौड़ी से दमड़ी, दमड़ी से धेला, धेला से पाई, पाई से पैसा, पैसा से आना और आना से रुपया।
जो कभी सबसे बड़ा रुपया था, आज वह सबसे छोटा होकर रह गया है। जिस रुपए के भाग ही नहीं हो सकते, वह अभागा नहीं हुआ तो फिर क्या हुआ।
आज लोगों के पास दिखाने के लिए रुपया जरूर है, लेकिन उनके पास पैसा नहीं है। हम कैसे पैसे वाले, एक पैसा नहीं, हमारे जेब के हवाले। आज कबीर होते तो वे भी शायद यही कहते ;
यह कैशलैस मानुस कैसा ?
जेब में फूटी कौड़ी नहीं
रूपये को कहे पैसा!
© श्री प्रदीप शर्मा
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