श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फकीर की लकीर।)

?अभी अभी # १००२ ⇒ आलेख – फकीर की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लकीर तो लकीर होती है, क्या फकीर की और क्या साहूकार की। लकीर के फकीर तो हम लोगों ने बहुत देखे हैं लेकिन कभी किसी फकीर को लकीर पर चलते नहीं देखा। संत और सीकरी का जो रिश्ता होता है, वही रिश्ता एक फकीर का लकीर से होता है। फकीर न तो किसी लकीर पर चलते हैं और न ही अपने बाद कोई लकीर छोड़ जाते हैं।

लेकिन इन भक्तों को कौन समझाए। वे उसी लीक, उसी लकीर पर चलने की कोशिश करते हैं, जिस पर कभी फकीर चला था। फकीर तो फकीर था, जिस रास्ते पर चला, उसके कदमों के निशान ही लकीर बन गए। वह तो मंजिल तक पहुंच गया, भक्त फकीर की लकीर को ही पत्थर की लकीर समझ बैठे और वक्त की लकीर को ही पीटते रहे। यही लकीर आगे चलकर पंथ बन जाती है।।

कहीं लकीर है, कहीं रेखा है तो कहीं दीवार है। हमने अपनी सुविधा और स्वार्थ की खातिर कई लकीरें खींची हैं, कितनी ही लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन किया है। हमने कभी कोशिश नहीं की कि अमीरी और गरीबी की लकीर को मिटाया जाए।

हमें हमेशा यही सिखाया गया है कि अगर किसी लकीर को छोटा करना हो तो उसके पास एक बड़ी लकीर और खींच दो। गरीबी मिटाने का सबसे आसान तरीका है, आप अमीर बन जाओ। सुविधा और स्वार्थ की खातिर पाला बदलना, इस लकीर को लांघ उधर निकल जाना ही सफलता की कुंजी है। लकीर फकीरों के लिए नहीं बनी। हम जैसे समझदारों के लिए बनी है।

मैं कोई फकीर नहीं। लेकिन मुझे लकीर पर चलने का शौक है। पक्की सड़क के किनारे पर जहां भी मुझे कोई लंबी मोटी चूने की लकीर नजर आती है, मैं उस पर चलना शुरू कर देता हूं। मेरे लिए यह एक अभ्यास है, शारीरिक और मानसिक संतुलन का एक ऐसा तरीका है, जिसका किसी पंथ और विचार से कोई लेना देना नहीं। मैं जानता हूं, यह लकीर मेरी मंजिल नहीं, अपना प्रयोजन सिद्ध होते ही मुझे इस लकीर से किनारा करना है। कोई जरूरी नहीं कि लकीर पर चलने की इस कला का, किसी नट की तरह, दो बांसों के बीच, किसी रस्सी पर चलकर प्रदर्शन किया जाए।

जो बीच सड़क पर सीना तानते हुए, यातायात में बाधा पहुंचाते हुए, स्वयं एक पत्थर की लकीर बनाते हुए चलते हैं, अगर वे थोड़े अनुशासित हों, फुटपाथ पर एक जिम्मेदार नागरिक की तरह चलें तो कितना अच्छा हो।।

हमने अक्षर ज्ञान बाद में सीखा, पहले एक सीधी लकीर खींचना सीखा। पुराने समय में जब लाइन वाले कागज, कॉपियां नहीं आती थी, लिखने के पहले कागज़ पर एक लंबी लकीर खींची जाती थी।

मारवाड़ी हिसाब की पुरानी खाता बहियों और दस्तावेजों में एक लंबी लकीर पर ही सब कुछ लिखा जाता था। कहां अर्ध विराम है और कहां पूर्ण विराम। कुछ समझ में नहीं आता था।

कुछ लोग आज भी हिंदी में लिखते वक्त शब्दों का माथा नहीं बांधते। मुक्त विचार हैं, मस्तिष्क से बाहर आ गए। अब क्यों इनके माथे पर कोई लकीर लगाई जाए। मुक्त छंद, मुक्त गीत, मुक्त गद्य। जीवन में संयम हो, मर्यादा हो, अनुशासन हो, अगर हो तो बस लक्ष्मण रेखा हो।

बाकी सब लकीर ऐसी हों, जो सिर्फ हवा और पानी में ही नजर आएं, और ओझल हो जाएं। इंसान हवा पानी की तरह एक हो जाए। हमारी अक्ल में इतने पत्थर भी ना हों, जो हम पत्थर की लकीरें बनाते फिरें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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