श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दीवारों के कान…“।)
अभी अभी # १००५ ⇒ आलेख – दीवारों के कान
श्री प्रदीप शर्मा
सुना है, दीवारों के भी कान होते हैं, कभी देखा नहीं ! वैसे हम सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन हमने भी दीवारों को हमारी बातें सुनते, देखा है। अब आंखों देखी बात तो झूठ नहीं हो सकती न। उनकी पीठ सुनती है, हमने लोगों को कहते सुना है। जब पीठ सुन सकती है, तो दीवार क्यों नहीं।
बात कभी यूं ही शुरू नहीं होती ! हम जब आपस में बातें करते हैं, तो बेचारी दीवारें कान लगाकर हमारी बात सुनती हैं। दीवार खड़ी ही इसीलिए होती है, कि कोई बाहर वाला हमारी बातें नहीं सुने। दीवार तो एक आड़ है। अगर दीवार नहीं होती तो शायद बात, दूर तलक जरूर जाती।।
हुआ यह कि अभी कुछ दिनों के लिए हम दीवारों को ताले में बंद कर बाहर गांव चले गए। आप भले ही मुंबई जाएं, या नोएडा, बाहर जाने को बाहर गांव जाना ही कहते आए हैं हम तो। खैर, हम तो घर ताला लगाकर, दीवारों के भरोसे छोड़ गए। आजकल कोई दीवार फांदकर घर में प्रवेश नहीं करता।
हो सकता है, हमारे घर से बाहर जाने के बाद, दीवारों ने यह गाना गाया हो ;
दीवारों से, ये मत पूछो
दीवारों पे क्या, गुजरी है
गुजरी है…
Who cares! मिट्टी, ईंट, सीमेंट की दीवार, हम उसे ज्यादा मुंह नहीं लगाते। खैर, दो चार दिनों में हमें वापस घर तो आना ही था, दरो दीवार से सामना करना ही था।।
हम जैसे ही मध्य रात्रि को वापस घर आए, दीवारें ज्येष्ठ की गर्मी में भट्टी जैसी तप रही थी, और सांय सांय कर रही थी। सन्नाटे का शोर हमें दीवारों से आता प्रतीत हुआ। पहले हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। यह आवाज दीवारों से आ रही है, या फिर हमारे कान बज रहे हैं।
हमें अपने कानों पर तो भरोसा था, लेकिन हमारे कानों को दीवार से आती सांय सांय आवाज पर भरोसा नहीं हो रहा था।
हमारे आने से शायद दीवारों को भी ठंडक मिली, क्योंकि हमने आते ही कूलर में पानी डाला, पंखे चालू किए और सुबह होते ही मुरझाए हुए पौधों को पानी पिलाया।।
आप मानें या ना मानें, सुबह तक दीवारें शांत हो चुकी चुकी थी। जो भी सांय सांय अथवा सिसकी जैसी आवाज थी, वह थम चुकी थी, हमें लगा, अब दीवारें हमसे बातें करना चाहती हैं।
हमने मंदिर में मूर्तियों को बोलते, बातें करते सुना और देखा है। दीवार पर लगी कुछ तस्वीरें भी बोलती हैं, हमसे बातें करती हैं। दीवारें इस घर में हमसे पुरानी हैं। नींव के साथ साथ ही खड़ी हुई हैं। हमारी एक तरह से बुनियाद है यह दरो दीवार। आज हमें महसूस हुआ, हमसे ही घर, घर कहलाया, और दीवारों ने भी यही दोहराया।।
इसे जब हम दीवाल THE WALL कहते हैं तो यह मजबूती से खड़ी रहती है, लेकिन जब यही दीवार, नफरत की दीवार हो जाती है, तो THE WAR हो जाती है। वैसे इन दीवारों का दिल भी होता है, जो धड़कता भी रहता है, लेकिन हम सब इस सत्य से अनजान, दीवारों में सूराख किया करते हैं, एक नहीं कई, और उसमें कीलें ठोका करते हैं, मानो दीवार, दीवार नहीं, कोई सलीब हो। और उस पर प्रेम से कैलेंडर और तस्वीर टांग दिया करते हैं। फिर भी दीवार कभी उफ तक नहीं करती।
अब घर हमें काटने को नहीं दौड़ता। दीवारें हमारा दुख दर्द सुनती, समझती, जानती हैं, हमने भी उसका दुख, दर्द पहचान लिया है। हम दीवारों से अब माथा नहीं फोड़ते, अपना सर नहीं खपाते, माथा झुकाकर उसका धन्यवाद करते हैं। बहुत कुछ कहने, सुनने लग गई हैं आजकल दीवारें, क्योंकि अब उसके और हमारे बीच कोई पर्दा नहीं, कोई दीवार नहीं..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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