श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उबासी।)

?अभी अभी # १००७ ⇒ आलेख – उबासी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो सुबह बासी मुंह उठते ही आ आए, उसे उबासी कहते हैं। सुबह जब, रात भर की थकान के कारण आँखें खुलने से इंकार कर देती हैं, तब मजबूरन मुंह को अपना मुंह खोलना पड़ता है। उबासी बिना किसी ऑक्सीजन के सिलेंडर के, शरीर को निःशुल्क प्राणवायु सप्लाय करती है, बिना किसी शुक्रिया, करम, मेहरबानी के।

उबासी को अंग्रेजी में yawn याॅन कहते हैं। भले ही उबासी आए न आए, यॉन शब्द का उच्चारण करने के लिए पूरा मुंह तो खोलना ही पड़ता है। उबासी आलस्य और सुस्ती का प्रतीक है। जब सामने वाला आपके मन की नहीं, उबाऊ, अनावश्यक और बेतुकी बातें करने लगता है, तो आपके दिमाग़ का दही हो जाता है, और आप कितना भी कंट्रोल करें, अपनी जबान को लगाम दें, मुंह खुल ही जाता है, और उबासी अपनी असहमति प्रकट कर ही देती है।।

जिनकी सुराही सी गर्दन होती है, और छोटा, मासूम सा मुंह, उन्हें उबासी लेते वक्त बड़ी तकलीफ होती है। उबासी के वक्त मुंह अपनी मनमानी करता है, किसी की नहीं सुनता, और अपनी हैसियत से भी ज्यादा खुल जाता है। जिस कारण चेहरे की नसें भी तन जाती हैं और कभी कभी मुंह भी दुखने लगता है। बेचारे नवजात शिशु भी इस उबासी से नहीं बच पाते और जब उबासी के कारण उनका मुंह उनकी चेहरे की रचना से अधिक खुल जाता है, तो तनाव के दर्द के कारण, वे बेचारे अनायास ही रो पड़ते हैं। उस समय अगर आसपास कोई ना हो, तो बच्चे के रोने का कारण भी पता नहीं चल पाता।

हिचकी, डकार और उबासी वायु के अवरोध के शारीरिक विकार हैं। अधिक खाने से डकार, दिमागी थकान के कारण उबासी और हिचकी की तो पूछिए ही मत।

न जाने क्यों, हिचकी को किसी की याद से जोड़ दिया गया है। डकार और उबासी को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन कभी कभी जब हिचकियां बंद ही नहीं होती तो इसे हलके में नहीं लिया जाता। एक तरह का सांस का अवरोध ही तो है हिचकी। छींक और खांसी भी नाक और गले के ही सामान्य अवरोध हैं जिनकी सतत उपेक्षा नजला, सर्दी जुकाम और दमा – खाँसी को जन्म दे सकती है।।

एक वायु विकार और है जिसका असर वातावरण पर ही नहीं, ओज़ोन की परत तक पड़ता है, शालीन भाषा में इसे गैस की ट्रबल कहते हैं। उबासी अगर ठंडी बासी है, तो यह तो भयंकर बदबू है। लोग भी अजीब हैं, मूली के परांठे खा खाकर दुश्मनी निकालते हैं। उबासी अगर यॉन है तो यह अंग्रेजी का fart फार्ट है। आपने किशोर कुमार का वह गीत तो सुना ही होगा ; फार्ट मेरी जान, फटाफट फट। बात मेरी मान फटाफट फट।

यकीन मानिए, उबासी हो या डकार, हिचकी हो या फार्ट, सभी शरीर के नैसर्गिक साफ सफाई की युक्तियां हैं। ये ऐसे संकेत हैं, जिनकी अनदेखी करने से ही शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। एक तरह का अलार्म सिस्टम है यह। रात को सोने का वक्त हो गया, उबासी संकेत देती है, आप ध्यान नहीं देते। जब तक डकार नहीं आती, खाते ही रहते हैं। शरीर हिलेगा डुलेगा नहीं तो वायुमंडल तो डोलेगा ही। अगर आपका ड्राइवर वाहन चलाते वक्त उबासी ले रहा हो, तो तत्काल पैदल हो लें, या उसे पैदल कर दें। अभी हमें खुदा के पास नहीं जाना।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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