श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घृणा व्याख्यान …“।)
अभी अभी # १०१५ ⇒ आलेख – घृणा व्याख्यान
श्री प्रदीप शर्मा
~ HATE SPEECH ~
अपनी छोटी सी जिंदगी में व्याकरण के नाम पर parts of speech (शब्दभेद) से परिचय हुआ, अलंकार के रूप में figures of speech से भी रूबरू हुए, ढाई आखर प्रेम के भी पढ़े, और सबसे ऊंची प्रेम सगाई भी देख ली । किसे पता था, इस उम्र में आकर भी हम कोरे के कोरे ही रह गए, क्योंकि एक व्याख्यान तो अधूरा ही रह गया, शांति दूतों का अब क्या काम, मोटिवेशनल स्पीच से प्रभावित होते, इंडिया शाइनिंग का गुणगान करते, उसके पहले ही आइना हमसे पूछता है, कभी hate speech की तैयारी की, अपने आपसे प्रेम और पड़ोसी से नफ़रत करना सीखा ? अगर नहीं सीखा तो हेट स्पीच क्या खाक सीखा ।
हम मूर्खों जैसे आज भी रफी साहब का वही गीत गुनगुनाते रहे, नजर वो दुश्मन पर भी मेहरबां हो, और इधर दुश्मन ने हमारा गिरेबां ही पकड़ लिया । कबीरदास जाने किस जमाने में रहते होंगे । होगा शायद वह राम राज, जो कह गए ;
जो तो को कांटा बुवै,
तोहे बोव तू फूल ।
तोहि फूल को फूल है
वाको है तिरशूल ।।
हम बंदर से इंसान तो बन गए, फिर भी बंदरों वाली हरकत नहीं भूले । तीन बंदर हमें ज्ञान बांटते हैं, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो । क्या आंख बंद कर लेने से बुराई खत्म हो जाएगी, क्या कान में रूई ठूंस लेने से ध्वनि प्रदूषण कम हो जाएगा, बुरी बात तो सुनने से पहले ही बुरी लगने लगती है । जब कभी किसी की बुराई होती है, तो कान उधर ही लगे रहते हैं ।
हां, लेकिन तीसरा बंदर बहुत काम का है। बुरा मत कहो । जब हम बात करें तो मुंह से मोती झरने चाहिए। लेकिन अगर वाकई ऐसा होता तो आज के अभी अभी का शीर्षक कुछ और ही होता ।
कबीरदास जी निंदक के बड़े दीवाने हैं । बड़े लोकतांत्रिक आदमी प्रतीत होते हैं ये मिस्टर जुलाहे !
कहते हैं जो निंदा करे उसके लिए आंगन, कुटी, छवाय यानी विपक्ष के नेता के लिए कार, बंगला, और विशेष भत्तों की सुविधाएं मुहैया कराई जाएं । आज अगर कबीर विपक्ष में होते तो तबीयत से सत्ता पक्ष द्वारा बिना साबुन पानी के धो दिए जाते। बड़े निंदा ज्ञान बांटने चले थे ।।
जोक्स अपार्ट, फिर भी इस फकीर को मानना पड़ेगा । निंदक को स्वीकारा, उसे सम्मान दिया लेकिन उसने कभी नफरत की बात नहीं की । बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय ।
धन्य है महात्मा जी । अपने आपको ही भला बुरा कहने वाले हे विचित्र प्राणी, जरा बताना तो, तुम्हारा सीना कितने इंच का है । हमें तो बस हड्डियां ही नज़र आ रही हैं ।
स्पीच का जब जिक्र होता है तो शिकागो में स्वामी विवेकानंद का विश्व धर्म संसद में, ११ सितंबर १८९३ को शून्य पर दिया गया ऐतिहासिक व्याख्यान स्मरण हो आता है । देश के लिए ऐसे पल स्वर्णिम पल होते हैं, जो यश, कीर्ति और गौरव की ऐसी पत्थर की लकीर खींच जाते हैं, जो अमिट और अमर हो जाती है । विश्व गुरु तो तब ही दुनिया ने हमें मान लिया था ।।
विकास और प्रगति का अर्थ अच्छाई को रिवर्स गियर में लेना नहीं होता ।
रेपिडेक्स इंग्लिश ने कई लोगों को इंग्लिश स्पीच में सहायता की। सोशल मीडिया अच्छा बुरा नहीं देखता। सिर्फ नेकी ही नहीं, आजकल लोग हेट स्पीच भी व्हाट्सएप पर डाल देते हैं । हमारी नई पौद वही सीखेगी, जो हम उसे सिखाएंगे।
देखिए हमारी आज की राजनीतिक पार्टियों के आई टी सेल कितनी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहे हैं । कहीं ऐसा न हो कि रेपिडेक्स इंग्लिश कोर्स की तरह कल से विज्ञापन आना शुरू हो जाए, हेट स्पीच कोर्स, केवल पंद्रह दिनों में । स्थान सीमित ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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