श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भरे पेट का ज्ञान …“।)
अभी अभी # १०१९ ⇒ आलेख – भरे पेट का ज्ञान
श्री प्रदीप शर्मा
ज्ञान बांटने, और ग्रहण करने के लिए, पेट का भरा होना अत्यावश्यक है। जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकता, तो ज्ञानार्जन अथवा ज्ञान का विसर्जन कैसे संभव है।
भक्ति और ज्ञान की भूख किसे नहीं होती। होते हैं कुछ दानवीर, जो खुद भूखे रहकर भी औरों की भूख मिटाते हैं। ज्ञान का भी ऐसा ही है। सुना है, ज्ञान बांटने से बढ़ता है। इसलिए आपके पास ज्ञान हो या न हो, बांटने में ही इतना ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि मस्तिष्क में ज्ञान का भंडार जमा हो जाता है। ।
मंदिरों में आरती, प्रसाद, भंडारे का भी कारण यही है कि प्रसाद की आस में हमें कई आरतियां, प्राथनाएं याद हो गई ! आंख बंद करके जब आरती गाते थे, तब आंखों के सामने प्रसाद तैर जाता था। कभी पंडित जी प्रसन्न हुए तो पूरा लड्डू, कभी सिर्फ थोड़ा सा चूरा। तब से ही संतोष की आदत सी पड़ गई है। जिस दिन पंजेरी और ककड़ी का प्रसाद होता था, हथेली इतनी छोटी पड़ जाती थी, कि प्रसाद लेकर बाहर ग्रहण करते ही, कमीज़ से हथेली पोंछकर पुनः प्रसाद की लाइन में लग जाया जाता था।
ज्ञान की भूख इंसान को कहां कहां ले जाती है। कभी लाइब्रेरी तो कभी सरस्वती पुस्तक सदन और कभी काफी हाउस। कॉफी में ऐसा क्या है जो ज्ञान की भूख बढ़ाता है। कॉफी हाउस की कुछ कुर्सियां तो साक्षात व्यास पीठ नजर आती हैं। पूरा कॉफी हाउस किसी कथा के पांडाल की तरह, उनकी प्रतीक्षा किया करता है। उनकी सीट भी आरक्षित होती है। सभी जानते हैं, वे बहुत बड़े लेखक हैं। उनका आज का ज्ञान कल किसी पुस्तक का ज्ञान बनने वाला है, जिसे साहित्यिक पुरस्कार मिलना तय है। उनकी ओछी हरकतों और अश्लील इशारों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। ।
उम्र के साथ साथ पेट की जठराग्नि कम होती चली जाती है और बात बात पर खाने को उतारू आदमी, कम और गम खाने लगता है। आसाराम से जला आदमी, हर संत की ओर फूंक फूंक कर कदम रखता है। लेकिन ज्ञान मार्ग की ओर एक बार उठे कदम, कभी वापस नहीं लिए जाते।
जब तक इंसान का पेट भरा रहेगा, संसार में ज्ञान का आगार कायम रहेगा। जब भी किसी को ज्ञान पेलें, यह ध्यान रखें, कहीं वह भूखा न हो, वर्ना खाने को दौड़ पड़ेगा। इसीलिए कवि गोष्ठियों में आजकल चाय नाश्ते का प्रबंध भी रखा जाने लगा है। नेताओं को तो भाषण के बीच सड़े टमाटर और अंडे खाने की आदत पड़ चुकी है। लेकिन आजकल वे भी समझदार हो गए हैं। टीवी और सोशल मीडिया पर ही ज्ञान बांटते हैं। अब आप टीवी का स्क्रीन फोड़ने से तो रहे। ।
डिजिटल जगत में दुनिया का सारा ज्ञान सिमटकर फेसबुक पर आ गया है। सभी तरह के बौद्घिक विमर्श और कविता पाठ फेसबुक पर लाइव चल रहे हैं। जब तक आपका मुंह चलता रहे, पेट पूजा होती रहे, अपनी रुचि एवं स्वादानुसार इसे ग्रहण करते रहिए। उम्मीद है इसमें सब सार सार ही है, थोथा बिल्कुल नहीं। क्या भरोसा कभी आपको भी इस प्रकार का ज्ञान बांटने का अवसर मिल जाए …!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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