श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वक्त की रफ़्तार…“।)
अभी अभी # १०२० ⇒ आलेख – वक्त की रफ़्तार
श्री प्रदीप शर्मा
मेरी भाषा एक है, लेकिन परिभाषा अनेक ! मैं कभी बी.आर.चोपड़ा का वक्त हूं तो कभी महाभारत का समय। मैं ही काल हूं, मैं ही महाकाल, और मैं ही कोविड – 19 नाम से डिफेम और बदनाम कोरोना काल। जब आपकी कलाई में घड़ी बनकर शोभायमान होता हूं, तो रोजाना हर पल आपको टाइम बताता हूं। पल पल आपके पास, मैं रहता हूं। वक्त कितना आपके पास, मैं कहता हूं।
मेरी शान में साहिर साहब ने कई कसीदे गढ़े हैं। मैने आपको जितना नहीं डराया, उससे अधिक तो साहिर आपको डरा गए। आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे, कौन जाने किस घड़ी, वक्त का बदले मिजाज। इंसान कभी अपने मिजाज को नहीं देखता, वह कितना खराब है, कभी अंदर झांककर नहीं देखता। खुद बड़ा दूध का धुला हुआ है, जो कह उठता है, अभी वक्त बुरा चल रहा है।।
वैज्ञानिक हवा, प्रकाश, और ध्वनि तो ठीक, विद्युत की तरंगों तक की गति नाप लेते हैं, लेकिन कभी मेरी रफ्तार नहीं नाप पाए। विद्वानों ने समय की गणना तो कर ली, मेरे पल पल का हिसाब भी रख लिया, उधर आपने पलक झपकी, इधर मेरा एक पल पूरा हुआ। आप किसी को अपलक निहारते रहे, मानो समय ठहर गया हो, लेकिन मैं नहीं ठहरा। मेरी गति कोई नहीं जान पाया। मेरे आगे भी समय है, और पीछे भी समय। जब खुशी के पल होते हैं, तो मेरे पंख लग जाते हैं। बच्चों की गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्द खत्म हो जाती है। पत्नी मायके कुछ रोज के लिए जाती है। वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चलता। मजबूरी में बाबुल का घर छोड़ना ही पड़ता है। गोरी ससुराल चली।
अभी ना जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं ! काश वक्त ठहर जाता। कुछ लोग बचपन याद करते हैं तो कुछ अतीत के स्वर्णिम पलों को याद करते हैं। ५० साल पुराना, शादी का एलबम सामने खुला हुआ है, और आईने में आज की खुद की तस्वीर नजर आ रही है। रेडियो पर गीता दत्त का गीत बज रहा है। वक्त ने किया, क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम। वक्त ने बूढ़ा कर दिया, वर्ना गालिब, हम भी कभी जवान थे।।
इसके विपरीत, दुख के पलों में समय ठहर सा जाता है। दुख के, अब दिन बीतत नाहिं ! क्या दिन भी पहाड़ जैसे हो सकते हैं, क्या गम की रातें इतनी लम्बी भी हो सकती हैं, कि कभी उनकी सहर ही ना हो। वक्त के रहते यह मुमकिन नहीं। दुख की रात भले ही लंबी हो, फिर भी सुबह तो होगी ही। वक्त कितना भी खराब चल रहा हो, अच्छे दिन तो आएंगे ही। आपने देखा नहीं, कितना वक्त गुजर गया, अभी भी लोगों को भरोसा है, मेरे करन अर्जुन आएंगे, जरूर आएंगे।
जो समय के साथ चलना जानते हैं, वे कभी समय से नहीं पिछड़ते। जो समय के पाबंद होते हैं, वक्त भी उनकी कद्र करता है। कभी समय को भी अपना साथी बना लें। समय अच्छा कटेगा। सुख दुख में अगर समभाव बना रहे तो समय भी दोस्त बन जाता है ;
चले थे साथ मिलकर
चलेंगे साथ मिलकर
तुम्हें रुकना पड़ेगा
मेरी आवाज सुनकर
जब छोटे थे, तो आपस में स्टेच्यू स्टेच्यू खेलते थे। इधर स्टेच्यू बोला, और उधर उसी स्थिति में सामने वाले को तब तक रहना पड़ता था, जब तक ओवर नहीं बोल दिया जाता। हमारी स्टॉप वॉच घड़ी के समय को रोक सकती है, लेकिन समय की घड़ी को नहीं। आइए, समय की घड़ी से दोस्ती करें। वही अनमोल घड़ी है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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