श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुएं में भांग..!!“।)
अभी अभी # १०२२ ⇒ आलेख – कुएं में भांग..!!
श्री प्रदीप शर्मा
याद आया, कॉफी हाउस के उन दिनों, सभी समाचार पत्र चाटने, कई प्याले कॉफी उदरस्थ करने, और घंटों बहस के बाद भी जब कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था तो अंत में सभी पराजित वक्ता इस बात पर आम सहमति व्यक्त करते थे, कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता, पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है।
अपनी इस उपलब्धि पर मानो एक दूसरे को बधाई देते हुए, कल फिर मिलने के वादे के साथ, कॉफी हाउस की सुबह की सभा विसर्जित होती थी।
तब लोगों के पास आज की तरह एंड्रॉयड फोन नहीं था और ना ही घर में बुद्धू बक्सा। बस अखबार, रेडियो, लाइब्रेरी और चंद दोस्तों का ही सहारा था, जो बिना मुहूर्त के कभी भी साइकिल पर मुंह उठाए चले आते थे।
कटिंग कराने निकला था, अण्णा के यहां बहुत भीड़ थी, सोचा भाभी के हाथ की गर्मागर्म चाय पी ली जाए।।
हमने कुएं का पानी भी पाया है और भांग भी खाई है। गांव के कुएं का पानी सिर्फ मीठा ही नहीं होता था, पाचक भी होता था। लगता था वाकई उसमें भांग मिली है। दिन भर मस्ती ही मस्ती रहती थी। जो खाओ सब हजम। तब कहीं महंगाई और भ्रष्टाचार नजर नहीं आता था। नीम, आम और पीपल की छांव में कहां का तनाव। ठंडी हवा में घोड़े बेचकर सोते थे।
कब हम गांव से शहर और कुएं से ट्यूब वेल के पानी पर आ गए, पता ही नहीं चला। इंसान की बात छोड़िए, पीने के पानी पर भी भरोसा नहीं रहा। घर घर और दफ्तर में हेमा जी का KENT ब्रांड एक्वागार्ड हमारी प्यास बुझाने लगा।
सार्वजनिक प्याऊ का स्थान बिसलेरी ने ले लिया। मुल्क इतना आगे निकल गया है कि कुएं में भांग ढूंढते रह जाओगे।।
आजकल अधिकतर बहस टीवी पर, और सोशल मीडिया पर होती है जिसमें व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, फेसबुक और ट्विटर का अधिक योगदान है। पहले की बौद्धिक बहस आज सिर्फ राजनीतिक बहस बनकर रह गई है। बिना एक दूसरे को अच्छी तरह जाने पहचाने, फेसबुक पहले तो उन्हें आपस में जोड़ देती है और फिर बाद में उन्हें अकेला छोड़ देती है। कभी घर से बाहर नहीं निकलने वाले इंसान के हवा में हजारों फेसबुक फ्रेंड बन जाते हैं। और फिर दौर शुरू होता है विचारों के आदान प्रदान का। कहीं अपेक्षा तो कहीं उपेक्षा, कहीं व्यर्थ की बहस तो कहीं अनफ्रेंड और ब्लॉक की नौबत।
आज की परिस्थिति के लिए हम किसी कुएं अथवा भांग को दोष नहीं दे सकते। जब हवा और पानी दोनों में ही प्रदूषण हो, खाद्य पदार्थों में मिलावट के साथ साथ ही, केमिकल फर्टिलाइजर का जहर हो, और सामाजिक और राजनीतिक जीवन में धर्म और राजनीति का नशा हो, तो आप किस कुएं को दोष दोगे और बेचारी भांग क्या करेगी।।
कुआं और भांग हमारे जीवन का कभी सात्विक नशा था। वह छोड़कर आज हम वैचारिक रूप से भी इतने प्रदूषित हो गए हैं कि जिस डगर पर कभी प्रेम गगरी छलका करती थी आजकल उस राह पर नफरत के जहर भरे घड़े, सजाकर रखे हुए हैं।
और लोग बेचारे मजबूरन उन्हीं घड़ों से अपनी प्यास और बढ़ा रहे हैं। लोहे को लोहे से काटा जा रहा है। जहर का इलाज भी जहर से ही किया जा रहा है। इसे कहते हैं, कांटे से कांटा निकालना।
ऐसे में कहीं से अगर आवाज आए, कोई पीयो रे पियाला राम रस का, तो किसे फुर्सत जो निंदा रस छोड़ प्रेम रस का पान करे। धर्म और राजनीति के नशे के अलावा यह सरकार सभी नशों के खिलाफ है। जिन कुओं में कभी भांग थी उन्हें बुलडोजर के हवाले किया जा रहा है। सरकारी ठेके की दुकानें हैं नशा करने के लिए देसी और विदेशी दोनों।।
भांग का नशा इंसान को निकम्मा कर देता है। कुएं में भांग थी इन सत्तर सालों में, इसीलिए हम कुछ कर नहीं पाए। नशा रहित शुद्ध जल जल्द ही घर घर पहुंच रहा है। अब किसी कुएं में भांग नहीं है। शुद्ध पेय जल समय की मांग है। होश में आएं। व्यर्थ समय ना गंवाएं..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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