श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खो जाने का सुख…“।)
अभी अभी # १०९० ⇒ आलेख – खो जाने का सुख
श्री प्रदीप शर्मा
कुछ खो जाने, और सब कुछ खो जाने में बड़ा अंतर होता है। सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया! खो जाने पर कौन खुश होता है। तुझे खो दिया हमने, पाने के बाद, तेरी याद आए। जिंदगी में हमने क्या खोया, क्या पाया, आखरी वक्त, कौन हिसाब रख पाया।
अब चैन को ही लें! जहाँ चैन नहीं, वहाँ बैचेनी है। सब चाहते हैं, चैन की सांस लें। जहां सुख है, वहाँ चैन है। सोने में सुख है, सोने की चेन में भी सुख है। जब चेन गुम हो जाती है, कोई सुख चैन भी चुरा ले जाता है और नैन से नींद भी। खोने में दुख ही दुख है। कौन कहता है, सोने में सुख है। सोने में दुख ही दुख है। चैन से सोने में ही असली सुख है।
बच्चे अक्सर मेले में, भीड़ में, खो जाते हैं। एक गाय का बछड़ा, जब अपनी मां से बिछड़ जाता है, तो उसकी दशा और दिशा देखने लायक होती है। उसकी पुकार बड़ी मार्मिक होती है। जब कभी दुख में, तकलीफ में, विषाद में, हम ईश्वर को पुकारते हैं, वही दर्द उस जीव में अपनी वत्सला मां के लिए होता है। एक बछड़े की तरह, जब जीव को अहसास होता है, कि वह भी परमात्मा से बिछुड़ा हुआ है, उसकी पुकार में भी वही दर्द महसूस किया जा सकता है। लेकिन हम अब बच्चे नहीं, दूध पीते, गाय से बिछड़े, बछड़े नहीं, एक बड़े, समझदार इंसान हैं। अब हमारे पास खोने और पाने के लिए बहुत कुछ है। परमात्मा का क्या है। मंदिर में, आते जाते, वार त्योहार पर, हाय हैलो, दुआ सलाम होती रहती है। सुख संपत्ति घर आए, कष्ट मिटे तन का। जीने को और क्या चाहिए।
पाने में सुख ही सुख है। क्या खोने में भी सुख है! आपने बहुत खोया होगा, लेकिन क्या कभी आप खुद भी खोए हैं ? वाह, हम क्यों खोएं, खोएँ हमारे दुश्मन। आओ खो जाएँ कहीं, छोड़ दें, दुनिया ये ज़मीं! अरे, वह तो प्यार की, फिल्मों की बातें हैं। कभी कभी किसी के प्यार में खोना अच्छा भी लगता है। अच्छा, तो आप उस खोने की बात कर रहे हैं।।
कई बार खोएं हैं, अपने काम में, बीवी बच्चों और परिवार के प्यार में। यार दोस्तों के बीच, गीत संगीत की महफिलों के बीच! वही खोना ही तो जिंदगी को पाना है। जब एक बार तैरना आ जाए, तब ही डूबने का मज़ा आता है। पानी सर से ऊपर बहे, तब भी डर नहीं लगता।
कई बार ऐसा होता है, अकेले बैठे बैठे, हम कहीं खो जाते हैं। एकाएक, भीड़ में भी अकेले हो जाते हैं। हमें आसपास कुछ सुनाई नहीं देता, बस हम हां में हां किए जाते हैं। सामने वाला समझ जाता है। भाई साहब, कहाँ खो गए हैं। हम एकदम जागते हुए कहते हैं, नहीं तो। हां तो आप क्या कह रहे थे।।
अकेले में, एकांत में, शांत वातावरण में, कुछ सोचते सोचते, चिंतन मनन करते, अनायास कुछ पल ऐसे आ जाते हैं, जब हम अपने आप में खो जाते हैं। कोई विचार आता जाता नहीं है, कोई आवाज़ कानों तक नहीं पहुंचती, आँखें खुली होती हैं, लेकिन देखते हुए भी खोई खोई सी रहती है। नींद नहीं, खुमारी नहीं, पूरी जाग्रत अवस्था, फिर भी कहीं खोए खोए। ध्यान कह लें, भाव समाधि कह लें। कुछ पाने की चाह न होना ही वास्तविक खोना है।
बहुत खो लिया जिंदगी में, बहुत पा लिया। कभी खुद को खोकर देखें, हम कब अंदर से खाली हुए हैं। बाहर से इतना अंदर आता है, आखिर यह जाता कहां है। हमारी साँस पूरा हिसाब रखती है इस आवागमन का। सांस कभी नहीं रुकती, कभी नहीं थमती। कितनी खोई रहती है सांस हममें। चलती रहती है और हमें पता ही नहीं चलता। आइए, खो जाएं कहीं, इन साँसों से परे, एक ऐसे संसार में, जिसमें और किसी का प्रवेश नहीं। वहाँ न मैं है, न तू। बस तू ही तू! अलख निरंजन।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





