श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ऊंची दुकान फीके पकवान…“।)
अभी अभी # १११० ⇒ आलेख – ऊंची दुकान फीके पकवान
श्री प्रदीप शर्मा
जब भी स्वादिष्ट व्यंजनों का ज़िक्र होगा, मीठे पकवान सबसे पहले याद आयेंगे। चौरासी की योनि में छप्पन भोग बार बार नसीब नहीं होते। इस भोग योनि में जब जीव का गला सूखता है तब अच्छे अच्छों को पानी याद आता है, लेकिन जब सामने गर्मागर्म केसरिया, रस भरी जलेबियाँ निकाली जा रही हों, तो मुंह से लार ही टपकेगी, आंख से आंसू नहीं।
पकवानों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, पसंद अपनी अपनी, पकवान अपना अपना! कोई जलेबी से संतुष्ट तो कोई इमरती पर फिदा। सब पकवानों की किस्मत जुदा जुदा। आज के लोगों का पकवानों का व्याकरण इतना कमजोर है कि उन्हें रबड़ी, बासुंदी और कलाकंद में भेद ही नहीं पता। एक पाक कला प्रशिक्षण केंद्र में जब यह पूछा गया कि हलवाई किसे कहते हैं, तो एक जवाब यह भी आया, जो हलवा अच्छा बनाए उसे हलवाई कहते हैं। कहते हैं मुझको, हलवा हलवाई।।
आजकल हमें मीठा बोलने की नसीहत तो दी जाती है लेकिन साथ में यह भी हिदायत, कि मीठा कम खायें। क्या बच्चे क्या बूढ़े, क्या जमाना था, जब हमेशा लड्डू पेड़े और गुलाबजामुन का ही जिक्र होता था। गरीबों का भोजन दाल बाटी, आजकल स्वादिष्ट भोजन की गिनती में आ गया है। जो इंसान, घी में तरबतर, दो बाटी ठीक से नहीं खा सकता, उसके सामने मावा बाटी की बात करना, मावा बाटी का अपमान नहीं तो और क्या है।
आप जब किसी ऊंची मिठाई की दुकान से पकवान खरीदते हैं तो यह सोचकर ही खरीदते हैं कि यहां की मिठाई शुद्ध, मीठी व स्वादिष्ट ही होगी। और अगर पकवान फीके हुए तो शायद दूसरी बार कभी उस दुकान की ओर रुख नहीं करेंगे। यह जानते हुए भी, कि अधिक घी, मावा और शकर हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, हम मीठा खाने से समझौता नहीं करते।।
आज अगर कोई ऊंची मिठाई की दुकान वाला अगर अपना प्रचार इस तरह करता है तो क्या गलत करता है। फीके पकवान की ऊंची दुकान! यहां शुगर फ्री, कोलोस्ट्रल फ्री, स्वादिष्ट मिठाइयां उपलब्ध हैं। मेरे शहर में तो आजकल ऊंची दुकानों में फीके पकवान मिलना शुरू भी हो गए हैं। गरीब आदमी मीठे को तरसता है, और अमीर आदमी शुगर फ्री के लिए। गरीब आदमी पसीना बहाता है कुछ मीठा खाने के लिए! जब कि एक अमीर आदमी को शुगर फ्री मिठाई के लिए भी पैसा बहाना पड़ता है।
एक हमारे गंगा किनारे वाले छोरे, अरे वही पान वाले बनारसी बाबू, जो दो पैसे कमाने के बाद, के. बी.सी. के बिग बी बनकर भी साबुन, तेल और कुछ मीठा खिलाने से बाज नहीं आते, आजकल कमला पसंद पर उतर आए हैं। अब तो आप समझ गए, कौन बना बेवकूफ, और कौन बना करोड़पति। सबकी अपनी अपनी मति।।
हम तो आज भी किसी के घर जाते हैं और जब सौजन्यवश चाय कॉफी का न्योता स्वीकार नहीं करते, तो कुछ ठंडा हो जाए कहने पर, शिकंजी पर राजी हो जाते हैं और तब हमें नीबू की शिकंजी पेश कर दी जाती है। हम शिकंजी पी तो लेते हैं, लेकिन ईश्वर झूठ ना बुलवाए, उस वक्त भी हमारी आँखों के सामने, नागौरी की शिकंजी तैर रही होती है। मीठा हमारी कमजोरी है और नमकीन हमारी खूबी।
सब्जी में नमक हो न हो, भोजन के वक्त एक मुट्ठी सेंव सब स्वाद बराबर कर देती है। बढ़ते रहें इंदौर में मरीज और अस्पताल, सराफा और छप्पन दुकान की रौनक कभी कम नहीं होने वाली। ठाकुर जी का नित्य राजभोग भी होगा और छप्पन भोग भी। अपनी सेहत का खयाल रखें। दबाकर खाएं, डूबकर व्यायाम करें। अगर मीठे से परहेज हो, तो कोई ऐसी ऊंची दुकान तलाशें, जहां शुगर फ्री, फीके पकवान उपलब्ध हों। कैसी होती होगी, चाशनी वाली, शुगर फ्री, गर्मागर्म केसरिया जलेबी, और बिना नमक का नमकीन। नहीं होता यकीन।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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