श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शब्द और अपशब्द…“।)
अभी अभी # ११२५ ⇒ आलेख – शब्द और अपशब्द
श्री प्रदीप शर्मा
शब्द एक अक्षर या अक्षरों का वह समूह है जिसका बोलने या लिखने पर उसका कोई अर्थ निकलता है। शब्द‘ को ‘ब्रह्म‘ कहा है क्योंकि ईश्वर और जीव को एक श्रृंखला में बाँधने का काम शब्द द्वारा ही होता है। सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारम्भ भी शब्द से हुआ है। पंच तत्त्वों में सबसे पहले आकाश बना, आकाश की तन्मात्रा शब्द हैं। अन्य समस्त पदार्थों की भाँति शब्द भी दो प्रकार का है- ‘सूक्ष्म‘ और ‘स्थूल‘।
वैसे देखा जाए तो अपशब्द भी एक शब्द ही है, जिसका स्थूल अर्थ, अनर्थ ही है। असभ्य, अमर्यादित और अश्लील संवाद को अपशब्द कहा जाता है, जिसके लिए एक विशेष शब्द, गाली अथवा गारी, गढ़ा गया है।।
शब्द की तरह अपशब्द भी दो प्रकार के होते हैं स्थूल और सूक्ष्म। जिस तरह एक स्थूल शब्द जब सुर और ताल में निबद्ध, मंदिर और गुरुद्वारे में भावपूर्वक गाया जाता हैं, तो वह सबद कीर्तन हो जाता है, उसी प्रकार पूर्णब्रह्म लीलाधर श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में जब उन्हें चितचोर, छलिया और माखनचोर जैसे विशेषणों से संबोधित किया जाता है, तो वह भक्त का मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
अब जरा अपशब्दों के स्थूल स्वरूप का भी मुलाहिजा फरमा लीजिए।
शिशुपाल द्वारकाधीश पर गालियों की वर्षा कर रहा है और ठाकुर जी मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी दे रहे हैं कि निन्यानवे तक सब माफ है, लेकिन एक अपशब्द और, और सुदर्शन चक्र के प्रहार से शिशुपाल की इहलीला समाप्त हो जाती है।।
जो कड़वा लगे, वह शब्द हो ही नहीं सकता। अंधे का बेटा अंधा, यह शब्द सभी अपशब्दों पर भारी पड़ गया और भाइयों भाइयों के बीच महाभारत छिड़ गई। प्रेम से अगर गाली दी जाए, तो वह भी मीठी ही लगती है, अन्यथा गाली, किसी गोली से कम नहीं होती।
शब्दकोश की तरह गालियों का भी कोई अपशब्द कोश होता होगा। यूं तो शब्दकोश के लिए हर अपशब्द भी एक शब्द ही है, इसलिए सभी गालियों का अर्थ शब्दकोश में मिल जाता है। हर भाषा की अपनी गालियां होती हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इस संबंध में, अन्य भाषाओं की तुलना में, हमारी हिन्दी गालियां अधिक सम्पन्न और समृद्ध हैं।।
गालियों का भी अपना इतिहास रहा होगा। अपना गुस्सा और खीज प्रकट करने का एक आम माध्यम है गाली। अक्सर गाली बकी जाती है, जो सज्जन संकोचवश नहीं बक सकते, उनके कानों तक
फिर भी गालियां प्रवेश कर ही जाती हैं, क्योंकि गालियां सार्वजनिक होती हैं। मेरे जैसा कथित भला मानुस गुस्से में भी साला, गधा, हरामखोर और सूअर के बच्चे के आगे नहीं बढ़ पाता। (क्या पता, जुकरबर्ग को इसमें भी कुछ कम्युनिटी स्टैंडर्ड के खिलाफ नजर आ जाए! )
मेरा अन्य भाषाओं की गालियों की शब्दावली पूरी तरह खाली है। गालियां तो संस्कृत में भी होती ही होंगी। दुर्योधन और शिशुपाल ने कौन सी भाषा में गालियां दी होंगी, भाषा प्रेमी अवश्य जिज्ञासु होंगे। वैसे अपशब्द, अपशब्द होता है, और गाली, गाली।
धूम्रपान निषेध की तरह अगर गालियों पर भी, घर में और सार्वजनिक स्थानों पर रोक लग जाए, तो हमें भले ही चैन मिल जाए, लेकिन यकीन मानिए, गाली गलौच करने वालों की तो शामत ही आ जाएगी। कहां कहां, इधर उधर, अपना गुस्सा थूकते फिरेंगे बेचारे।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




