श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज़हर उगलना।)

?अभी अभी # ८५४ ⇒ आलेख – ज़हर उगलना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह विचित्र किन्तु सत्य नहीं कि जिस देश की मिट्टी सोना और हीरे मोती उगले, वहां उसी मिट्टी से बना इंसान अचानक ज़हर उगलने लगे। हमें अपनी धरती से सहन करने की शक्ति और प्रेरणा लेने को कहा जाता है। धरती भी आखिर हमारी मां है, उसका भी सब्र का कोई बांध होगा। जब इस धरती पर पाप बढ़ेंगे तो उस पर भी जरूर इसका असर पड़ेगा। ज्वालामुखी यूं ही नहीं फूट उठता। अरे कोई कारण होगा।

क्यों आते हैं भूकंप और जलजले और क्यूं फूटते हैं ज्वालामुखी। इंतहां हो गई बर्दाश्त की। बस कुछ कुछ यही फितरत इंसान की भी है। जब तक आदर और मान सम्मान मिलता है, वह भी मुंह में मिश्री घोलता है। दावत में अचानक रबड़ी खाते खाते अंधेरा हो जाए और रोशनी होते ही अगर पता चले कि रबड़ी में कुछ चलता फिरता काला था, तो निवाले का एकदम घर निकाला हो जाता है। प्रथमा ग्रासे मक्षिकापात: प्रथम ही ग्रास में हे सखी, मक्खी।।

हमारे भोजन को अमृत कहा गया है। सुगंधम् पुष्टि वर्धनम ! लेकिन अपमानजनक कड़वे बोलों के साथ भोजन नहीं पचाया जा सकता। कोई अगर एक तरफ कानों में ज़हर घोले और दूसरी ओर रबड़ी में केसर, तो जबान भी मुंह का स्वाद भूल जाती है। स्वादिष्ट केसरिया रबड़ी ज़हर हो जाती है।

कभी कभी खाने में असावधानीवश कुछ जहरीला पदार्थ मिल जाने से मेहमान फूड पॉइजनिंग के शिकार हो जाते हैं। उल्टी दस्त की शिकायत आम हो जाती है। इसी प्रकार अगर, किसी व्यक्ति को, अंधेरे में कोई जहरीला सांप काट खाए तो पूरे शरीर में जहर फैल जाता है। जितनी जल्दी जहर को शरीर से बाहर निकाला जाए, उतनी ही जल्दी स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है।।

करेला और नीम दोनों कड़वे होते हैं, लेकिन लाभकारी होते हैं। कड़वी बातें भी लाभकारी हो सकती हैं लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को कभी जहर के इंजेक्शन नहीं दिए जाते।

लोग कैसे मीठा खाकर जहर उगल देते हैं। जरूर अंदर कहीं जहर का भंडार होगा।

कांटे से कांटा निकाला जाता है और लोहा ही लोहे को काटता भी है। सिर्फ एक बूंद जहर काफी होता है किसी स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ को जहरीला बनाने के लिए। कैसे होते होंगे जहरीले इंसान, जो सिर्फ नफरत की आग ही उगलते होंगे और जहर भरी बातों के तीर ही चलाते होंगे।।

जो सांपों को अभय देते हैं, भले ही उनके कलेजे पर सांप लौटे, वे नीलकंठ ही कहलाते हैं। बुराई रूपी जहर को न निगलना और ना ही उगलना। ब्लड बैंक तो सुना था, आशुतोष नीलकंठ तो पॉइजन बैंक हैं। एक ऐसा स्विस बैंक जहां ज़हर भी अमृत की तरह ही सुरक्षित है। अगर हमें भी अमर होना है तो सहनशक्ति और धैर्य के साथ, जहर को कंठ में ही धारण करना होगा। और कुछ ना सही, तो कम से कम, हम यह प्रार्थना तो कर ही सकते हैं ;

हे नीलकंठ, हे महादेव

ऐसी कृपा अब कर दो।

मेरे मन में ज़हर भरा है

उसको अमृत कर दो।

हे नीलकंठ हे महादेव।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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