श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुरुत्वाकर्षण…“।)
अभी अभी # ८५९ ⇒ आलेख – गुरुत्वाकर्षण
श्री प्रदीप शर्मा
✓ GRAVITY ✓
हम यहां गुरुत्वाकर्षण के सैद्धांतिक अथवा वैज्ञानिक पक्ष की जगह सिर्फ गुरुत्व और आकर्षण पर ही अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।
Gravity का g किसी के लिए God, तो किसी के लिए गुरु अथवा किसी के लिए यह जमीन भी हो सकती है, जिसे हम पृथ्वी अथवा earth कहते हैं।
कवि और वैज्ञानिक में अंतर होता है। विज्ञान खोज और आविष्कार में विश्वास करता है, उसकी खोज सत्य की खोज होती है। जब कि कवि की उड़ान तो रवि से भी ऊपर की होती है। दुष्यंतकुमार जब एक पत्थर तबीयत से आसमान में उछालते हैं तो गुरुत्वाकर्षण बीच में नहीं आता, कवि के लिए आसमान ही थोड़ा नीचे आ जाता है और आसमान में सूराख हो जाता है और पत्थर वापस जमीन पर आ जाता है।।
सृष्टि पर किसका शासन है और किसका अनुशासन है, कोई नहीं जानता। यह कैसा आकर्षण है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चंद्रमा पृथ्वी की। सौरमंडल में भी यही परिक्रमा का चक्कर है। ग्रह नक्षत्र हों अथवा हमारे लिए टिमटिमाते तारे, ज्योतिष और खगोल शास्त्र के अनुसार उनका अस्तित्व और क्रियाशीलता का आधार अमूर्त, अस्पष्ट और मानवीय समझ से परे है। बस एक शब्द है manifestation जिसे आप चाहें तो प्रकट अथवा प्रकाशित कह सकते हैं।
हमारे सर पर आसमान है, चांद सितारे हैं। नवग्रहों को हम देवता मानते हैं, सौरमंडल की तरह पूजा और हवन में उनका भी मंडल स्थापित होता है। हम वहां तक पहुंचे अथवा ना पहुंचे, हमारे जीवन में उनका प्रवेश अप्रत्यक्ष रूप से तो है ही। क्या यह प्रभाव आकर्षण नहीं।।
इस धरा में ऐसा क्या आकर्षण है कि देवता भी यहां मानव जन्म पाने के लिए तरसते हैं। यही गुरुत्व ही तो वह गुरु तत्व है, ईश्वर तत्व है जो हर जीव के आ#e-abhivyaktiकर्षण का केंद्र है। कहीं आकर्षण है तो कहीं चुंबकीय प्रभाव। एक पक्षी केवल अपने पंखों के सहारे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के विपरीत आसमान में उड़ लेता है, विज्ञान उसे गुरु मान वायुयान में पंख लगा लेता है और इंसान भी हवा में उड़ने लग जाता है।
मनुष्य के पंख भले ही नहीं हों, उसकी कल्पना और इच्छा शक्ति की उड़ान की कोई सीमा नहीं। उसकी प्रकृति के छुपे हुए रहस्यों को जानने की प्रवृत्ति और जिज्ञासा कभी शांत नहीं होती। अपने से बेहतर के प्रति लगाव और आस्था ही, अपने से गुरु के प्रति आकर्षण है।।
महर्षि अरविंद ने जिस महामानव की कल्पना की है वह कोई superman नहीं, superhuman है और वह और कोई नहीं हमारा आत्म गुरु ही है।
गुर से ही गुरु शब्द अस्तित्व में आया है। शायद इसीलिए गुरु अथवा ईश्वर के प्रति हमारा स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है। जिस तरह यह पवित्र धरा अपने गुणों के कारण देवताओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है हम भी गुरुत्व अर्थात् अच्छाई की ओर आकर्षित हों।
गुण के गाहक सहस नर, यूं ही नहीं कहा किसी ने।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





