श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताबी कीड़ा…“।)
अभी अभी # ८७४ ⇒ आलेख – किताबी कीड़ा
श्री प्रदीप शर्मा
जो कीड़ा क़िताब चाट जाए, उसे किताबी कीड़ा कहते हैं। इंसानों में यह काम अगर एक बुद्धिजीवी नामक प्राणी करता है तो कीड़ों मकोड़ों में यह दायित्व एक दीमक निभाती है। अगर हमें विरासत में मिले अथाह ज्ञान रूपी सागर को सुरक्षित रखना है तो हमें उसे इन दोनों से बचाकर सुरक्षित रखना होगा।
ज्ञान के हमारे तीन आगार
हैं, श्रुति, स्मृति और पुराण।
सृजन एक सतत प्रक्रिया है, जिसे जब सहेजा जाए तो यह ग्रंथ का आकार ले लेती है। हमारे यहां पुस्तकों में सरस्वती का वास होता है, इसलिए इन्हें विद्या भी कहते हैं। पुस्तकों की ही तरह विद्यालय भी ज्ञान के आगार होते हैं और जो हमें ज्ञान प्रदान करते हैं उन्हें हम शिक्षक, अध्यापक अथवा गुरु।।
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। कुछ लोग बुद्धि का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने में लगा देते हैं, बाकायदा किसी नालंदा अथवा तक्षशिला विश्वविद्यालय से विधिवत ज्ञानार्जन प्राप्त कर, संचित ज्ञान का सदुपयोग करते हैं, पठन, पाठन करते हैं तथा साहित्य सेवा करते हैं तो कुछ केवल बुद्धि के स्तर पर गोष्ठी, वाद विवाद और बहस में अपने ज्ञान की बौद्धिक उल्टी करा करते हैं। उनका साहित्य वादी प्रतिवादी हो जाता है। कहीं पूरब पश्चिम, तो कहीं वाम, दक्षिण हो जाता है।
ऐसे लोग पहले किताबों को चाटते हैं और बाद में कॉफी हाउस की बहस और गोष्ठियों में श्रोताओं का दिमाग चाटते हैं। इस प्रजाति में ऐसे कवि, लेखक और साहित्यकार प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करते हैं। एक समय था, जब इनका एक गणवेश भी होता था। आँखों पर मोटा चश्मा, खिचड़ीनुमा दाढ़ी, ढीला ढाला कुर्ता पायजामा, जो कालांतर में फटी जीन्स में परिवर्तित हो गया। जहां कभी एक झोला और डायरी पेन था, वहां आजकल एक अदद एंड्रॉयड हो गया। कल का बुद्धिजीवी भी आजकल डिजिटल हो गया।।
किताबों से दीमक का भी वही रिश्ता है, जो एक बुद्धिजीवी का ! वह भी जब किताबें चाटती हैं, तो कोई कसर नहीं छोड़ती, पूरी ही चाट जाती है। लेकिन किसी बुद्धिजीवी की तरह हमारा दिमाग नहीं चाटती। दीमक से किताबों को भले ही खतरा हो, किसी इंसान को नहीं।
हमारे यहां पुस्तकों और ग्रंथों की पूजा होती है। भागवत, पुराण, गीता, रामायण और गुरुग्रंथ साहब हमारे धार्मिक ग्रंथ हैं, जिन्हें हमने ईश्वर का ही दर्जा दिया हुआ है। व्यासपीठ और धार्मिक स्थलों पर इनका पारायण एक उत्सव का स्वरूप ले लेता है जिसे ज्ञान यज्ञ की संज्ञा दी गई और जहां सतत ज्ञान की गंगा प्रवाहित होती रहती है।।
हमारे सत्साहित्य को हमें दीमक और बुद्धिजीवी इन दोनों से बचाकर रखना है। दीमक अगर किताबों को खोखला करती है तो एक बुद्धिजीवी लोगों के दिमागों को खोखला करता है। हवा हो गए वो दिन, जब लोग बुद्धिजीवी को इज्जत की निगाह से देखते थे। क्या दिन थे वे भी, जब कॉफी की भाप और सिगरेट का धुआं एक साथ समां बांधता था। अब बेचारा इंसान फिक्र को धुएं में उड़ा भी नहीं सकता। कितनी कुंठा, कितना संत्रास, और बेचारे नित्शे, काफ्का और कामू ! आखिर गम तो गलत करना ही पड़ेगा। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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