श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धरती कहे पुकार के।)

?अभी अभी # ८७५ ⇒ आलेख – धरती कहे पुकार के ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह धरती हमारी मां है, इसकी गोद सदा हरी भरी रहती है । इसके आंचल में सिर्फ दूध और पानी ही नहीं, मणि रत्न, हीरे मोती , खनिज सभी है। इसी धरती पर अगर नेकी का दरिया है तो आग का दरिया भी । उसकी आंख में करुणा ममता है, दो तिहाई जल से यह सभी प्राणियों की प्यास बुझाती है। यह जब आंसू बहाती है, तो नदी नाले पूर हो जाते हैं, उनमें बाढ़ आ जाती है । अपने आंसुओं से सींचती है यह अपने कई करोड़ पुत्र रत्नों को ।

यह हमेशा धैर्य धारण करती है, इसीलिए तो इसका नाम धरती है । सभी जलचर, नभचर और थलचर इसकी ही गोद में पलते हैं, सबके दाना पानी की यह व्यवस्था करती है । चींटी से हाथी तक की उसे चिंता रहती है ।।

ऊपर से शांत और समृद्ध दिखाई देने वाली इस धरती के गर्भ में क्या है और क्या नहीं । कहीं जड़ और कहीं चेतन, कहीं सागर तो कहीं मरुस्थल, कहीं दिन तो कहीं रात, कहीं सूखा तो कहीं बरसात ।

जो सहन करता है, धैर्य धारण करता है, उसके अंदर सिर्फ ममता ही नहीं, आग भी होती है । कब तक आंसू बहाती रहेगी यह धरती । कभी तो उसकी सहनशक्ति की भी अति होती है । उसका दर्द जब आंसुओं से बयां नहीं होता

तो ज्वालामुखी बन फूट पड़ता है । जहां कभी कलकल सरिता बहती थी, वहां आग का दरिया बह निकलता है । सृष्टि का यही रूप तो तांडव का रूप है ।।

मां स्वरूपा यह धरती भी जब अपनी ही संतानों की काली करतूतों से त्रस्त हो जाती है, तो वह अपना संतुलन खो बैठती है । भूकंप और जलजला यूं ही नहीं आता । शिव जी का तीसरा नेत्र यूं ही नहीं खुलता ।सूखा, बीमारी, हैजा तपेदिक और कोरोना वायरस सब हमारे ही पापों की सजा है ।

विधि का विधान अपनी जगह है और मनुष्य का ज्ञान अपनी जगह । वह अपनी प्यास बुझाने के लिए कभी कुएं खोदता था, बावड़ियों का निर्माण करता था । फिर उसने नदियों पर बांध बनाना शुरू कर दिया, क्योंकि उसे बिजली चाहिए थी। उसने जंगल काटने शुरू कर दिए क्योंकि उसे बस्ती बसानी थी । इतना ही नहीं, पहाड़ों पर भी उसकी लालच भरी निगाह पड़ गई । उसके लालच ने पर्यावरण तक को लील लिया ।।

यही धरती हमारी रणभूमि है और यही कर्मभूमि ! अगर कहीं एक महल बनता है तो साथ में कई झोपड़ियां भी बस जाती हैं । माटी का यह पुतला सभ्य क्या हुआ, उसने धरती को ही बांटना शुरू कर दिया ।

साहिर बड़े तल्ख शब्दों में कहता है ;

कुदरत ने हमें बख्शी थी

एक ही धरती

हमने कभी भारत कहीं

ईरान बनाया ।

हमने पहले विश्व को कुटुंब माना, फिर अपनी इस धरती के ही कई टुकड़े कर दिए । अब इसके एक एक टुकड़े के लिए हम अपनी जान की बाजी लगाते हैं ।

एक मां के दिल पर क्या गुजरती है, जब उसका कोई लाल शहीद होता है ।

साम्राज्य और सम्राट ही तो हमारा इतिहास रहा है । दो योद्धा रणभूमि में खड़े हैं, एक अर्जुन कृष्ण की शरण में जाता है, शस्त्र उठा लेता है । ये है गीता का ज्ञान ! एक सम्राट अशोक कलिंग युद्ध के खून खराबे के पश्चात् शस्त्र त्याग कर बुद्ध की शरण में चला जाता है । और एक हुआ विश्व विजय का सपना संजोए सिकंदर, जिसकी जब एक फकीर से भेंट होती है, तो बड़े गर्व से कहता है, मांगो जो मांगना है, मैं सिकंदर महान हूं । और वह फकीर निडर हो जवाब देता है, भाई मेरे, तुम मुझे क्या दोगे ? तुमने मेरी धूप रोक रखी है, बस वही मुझे वापस कर दो ।

ये धरती गवाह है हमारे सब कर्मों की । हम इसके आंगन में खेल तो रहे हैं लेकिन इसके दुख दर्द से ही परिचित नहीं हैं । कैसे पुत्र हैं हम । ये माटी सभी की कहानी कहेगी ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Mukta Mukta
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बहुत सार्थक चिंतन।