श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हृदय परिवर्तन।)

?अभी अभी # ८८० ⇒ आलेख – हृदय परिवर्तन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हृदय हमारे शरीर का वह अंग है, जो हमेशा धड़कता ही रहता है। बड़ा नाजुक अंग है यह, हमेशा घड़ी की टिक टिक की तरह, धक धक किया करता है, एक मिनिट में 60 से लगाकर 90 बार तक।

इसमें घड़ी की तरह कांटे नहीं होते, फूल की तरह कोमल होता है यह हृदय, क्योंकि यहां प्रेम का वास है। कहते हैं, आत्मा और परमात्मा दोनों का गुप्त रूप से वास यहीं है।

यह अगर थोड़ा भी छलका, तो प्रेम प्रकट हो जाता है।।

कहां हम और कहां राम भक्त हनुमान, फिर भी हमारे प्रिय भाई मुकेश गलत नहीं कह गए ;

जिनके हृदय श्री राम बसे,

उन, और का नाम लियो न लियो।

हमारे हृदय में कौन विराजमान है, क्या यह जानना इतना आसान है।

बोलचाल की भाषा में, यही तो वह दिल है, जो कभी बेचारा, कभी पागल, तो कभी दीवाना है। यही वह जिया है, जो कभी कभी पिया के लिए बेकरार रहता है। कभी सुख चैन, तो कभी बैचेन, यही इस दिल की दास्तान, दिन रैन।।

कहने को छोटा सा दिल, लेकिन कहीं यह विशाल हृदय तो कहीं संग दिल, कोई दिल वाला, तो कोई दिल का मरीज। कितने हृदय रोग विशेषज्ञ तो कितने हृदय सम्राट।

सबके अपने अपने ठाठ।

आज विज्ञान भले ही इस हृदय की एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्ट और बायपास कर ले, कितनी भी चीर फाड़ कर ले, हृदय का प्रत्यारोपण भी कर ले, लेकिन इसकी भावना को छूना किसी चिकित्सक के बस का नहीं।।

सभी का हृदय एक समान धड़कता है, फिर भी सारे इंसान एक जैसे क्यों नहीं होते। यह चित्त क्या बला है, इंसान भला और बुरा क्यों होता है, यह तो सब ज्ञानी ध्यानी जानते हैं, लेकिन क्या किसी बुरे इंसान का हृदय परिवर्तन इतना आसान है।

सुना है, नर सत्संग से, क्या से क्या जो जाए ! अगर ऐसा होता तो शायद महा ज्ञानी शिव भक्त रावण, विभीषण बन जाता। वाल्मीकि पहले डाकू थे, और अंगुलिमाल की तो पूछिए ही मत। कहीं निर्मल मन की बात होती है तो कहीं कुत्ते की पूंछ की।।

काश कोई ऐसी जादू की छड़ी होती कि इधर फिराई और उधर हृदय परिवर्तन, जैसा आजकल राजनीति में देखने में आता है। कभी कमल तो कभी कमलनाथ, कल शिवराज तो आज मोहन यादव। यथा महाराजा, तथा प्रजा।

सबका साथ, सबका विकास के साथ साथ, कितना अच्छा हो, सबका हृदय परिवर्तन भी हो जाए तो ना ही रहेगा बांस, और ना ही बजेगी अलग अलग सुरों में बांसुरी। बस सिर्फ एक, चैन की बांसुरी ! लेकिन यह क्या, राधिके तूने बंसुरी चुराई ..!!??

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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