श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुर्गी और अंडा।)

?अभी अभी # ९०० ⇒ आलेख – मुर्गी और अंडा ? श्री प्रदीप शर्मा ?

सुबह सुबह मुर्गा बांग देता है और मुर्गी अंडा ! मुर्गा अगर दुनिया को जगाने का काम करता है तो मुर्गी सुबह अंडा दे, सबके लिए सुबह का नाश्ता तैयार करती है। जो मुर्गे की बांग से भी सुबह जल्दी नहीं उठते, वे लेट ही सही, अंडे का आमलेट ज़रूर खा लेते हैं।

स्कूल में सुबह मास्टरजी के डंडे से पहले हमारा हाथ गर्म होता था, फिर हमें सबके सामने दंड – स्वरूप मुर्गा बनाया जाता था। सह शिक्षा का अभाव होने के कारण हमें पता नहीं, लड़कियों को स्कूल में मुर्गा बनाया जाता था या मुर्गी।।

लोगों को सुबह जल्दी जगाना वैसे तो सामाजिक जागरण का ही काम है, लेकिन कुछ सोनू निगम जैसे सूर्यवंशी कलाकार, देर रात तक सुर की साधना के कारण, सुबह सुबह की मुर्गे की बांग अथवा अजान, उनकी नींद में खलल डालती है। आप जाग गए, यही बहुत है, अपनी ध्वनि के विस्तार से दुनिया को सर पर उठा लेना कहां की समझदारी है। जो बेजुबां प्राणी होता है, उसे तो इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। अज़ान का कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन बेचारा मुर्गा तो हलाल हो ही जाता है। शायद इसे ही कहते हैं, नेकी कर, फिर अपनी गर्दन आगे कर।

निष्काम कर्म करते हुए अगर आपको अपनी गर्दन भी कटवानी पड़े, तो कोई हर्ज नहीं। जो उस पे जान देते हैं, वो मरते नहीं कभी। उस पर मरना ही अपने उसूल के लिए मरना है। मुर्गे मुर्गी का त्याग कहीं लिखा जाएगा या नहीं, जब तक सूरज उगता रहेगा, मुर्गा बांग देता रहेगा, मुर्गी अंडे देती रहेगी।।

हम एक इंसान होकर वह नहीं कर पाते, जो मुर्गा और मुर्गी जानवर होकर कर गुजरते हैं। संडे हो या मंडे, रोज अंडा, चिकन और मुर्गा अपनी सेवाएं मानवता को दिया करता है।

शायद इसी से प्रेरित होकर घड़ी में सुबह की पांच बजती है और अभी अभी की शक्ल ले, रोज एक अंडा फेसबुक पर उतर आता है। यह अभी अभी उतना परिपक्व और सेहतमंद नहीं होता, फिर भी इस बहाने सुबह सुबह सृजन सुख अवश्य मिल जाता है।।

सृष्टि में कुछ नियम है, मर्यादा है। जीव जंतु तक इसी मर्यादा में बंधे हुए हैं। एक चींटी से लगाकर चिड़िया तक, सभी प्राणी, बिना गीता पढ़े अपना कर्म कुशलता से करते रहते हैं। हमारे जीवन की सार्थकता भी इसी में है कि अपने स्वार्थ से उपर उठकर, ईश्वर प्रदत्त अपनी प्रतिभा और प्रभाव का उपयोग कम से कम हमारे आसपास के संसार में तो हो।

प्यार और निष्काम सेवा से बड़ा कोई परमार्थ नहीं। शिक्षा का क्षेत्र बड़ा विस्तृत है। दीन दुखियों की दुनिया में कमी नहीं। अंतस में ज्ञान का प्रकाश हमें अपने कर्तव्य का बोध कराता है। मुर्गा बनें, जागरूकता फैलाएं, बांग दें, मुर्गी बनें, अंडे का फंडा समझें। फूल को रोज खिलना है, कोई उसे देखे, या ना देखे, सूरज को रोज उगना है, लोग चाहे लंबी तान सोते रहें। आप अभी अभी पढ़ें, अथवा कभी नहीं पढ़ें, ईश्वर करे, यह क्रम अनवरत चलता रहे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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