श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिजीवी और विलासिता…“।)
अभी अभी # ९११ ⇒ आलेख – बुद्धिजीवी और विलासिता
श्री प्रदीप शर्मा
यहाँ हम बुद्धि-विलास की बात नहीं कर रहे। बुद्धि और विलासिता की बात कर रहे हैं। किसी के पास अगर बुद्धि है, और पैसा नहीं है, तो वह कहाँ का बुद्धिजीवी। क्या बुद्धिजीवी झुग्गी -झोपड़ी अथवा पंचम की फेल में रहता है।
खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है। बहुत से पैसे वालों को यह कहते सुना है, पैसा कमाने में अकल लगती है ! पैसे झाड़ पर नहीं उगते। हमारा पैसा है, हम उड़ा रहे हैं, तुम्हारे पेट में क्यूँ दर्द हो रहा है।।
वैसे अक्लमंद को बुद्धिजीवी नहीं कहते। एक बुद्धिमान व्यक्ति और बुद्धिजीवी में अंतर करना इतना आसान भी नहीं होता। जो अंतर चाय और कॉफ़ी में होता है, वही अंतर एक अक्लमंद और बुद्धिजीवी में होता है। चाय सड़क किनारे किसी भी ठेले पर पी जा सकती है, कॉफ़ी के लिए कॉफ़ी हाउस है न !
कॉफ़ी हाउस में केवल कॉफी नहीं पी जाती, बहुत कुछ होता है। राजनीति पर, मार्क्स, लेनिन पर, गर्मागर्म बहस होती है। प्याले में तूफान उठता है, कॉफ़ी के खत्म होते ही थम जाता है।
अगर कॉफ़ी खत्म नहीं होती, तो अब तक कई क्रांतियाँ हो चुकी होती।।
बुद्धि और ज्ञान का भी पूरब और पश्चिम का संग है। बुद्धि हमें पश्चिम की ओर ले जाती है और ज्ञान पश्चिम को पूरब की ओर वापस खींचता है। योग से भोग की राह पश्चिम है, और भोग से योग की राह पूरब। बुद्धि का स्वामी विद्वान भी कहलाता है, और संस्कृत का जानकार प्रकांड विद्वान। विद्यालंकार जैसे नाम अपने आप में अलंकार होते हैं।
बुद्धि को आप रस और विलास से जुदा नहीं कर सकते। विद्वान रसिक होते हैं, और बुद्धिजीवी विलासी। हो सकता हो, विद्वान और बुद्धिजीवी में हिंदी अंग्रेज़ी का भेद हो। बुद्धिजीवी को अंग्रेज़ी आती है और ग़ज़ब की आती है।।
जहाँ बुद्धिजीवी है, वहाँ हेमिंग्वे के शब्दों में wining, dining, concubining है। एक प्रेरणा होती है, जिसे प्रेमिका कहा जाता है, बुद्धिजीवी रखैल जैसे घटिया शब्द पसंद नहीं करते। मी टू में सब कुछ बयां हो जाता है।
न जाने क्यूँ, बुद्धि को सृजन से जोड़ दिया गया है और सिगरेट और शराब को सृजन से। जहाँ धुआं है, वहाँ आग है, सीने में जलन है। यही आग, यही जलन सृजन है। एक बुद्धिजीवी का आदर्श काफ़्का, सार्त्र, नीत्शे और मार्क्सहै। कुंठा, संत्रास और शून्यता का अहसास ही बुद्धिजीविता है। यहाँ सूरज की रोशनी में नहीं, अंधेरे बंद कमरों में सृजन होता है, यहाँ के सूरजमुखी अंधेरों में खिलते हैं। एक चिथड़ा सुख ही उसकी नियति है। यहाँ सभी अपने अपने अजनबी हैं, बंद गली का आखरी मकान ही बुद्धिजीवी का असली मुकाम है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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