श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बेजोड़ जोड़ी…“।)
अभी अभी # ९१५ ⇒ आलेख – बेजोड़ जोड़ी
श्री प्रदीप शर्मा
क्या जोड़ से ही जोड़ी बनती है ? एक समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी था ! वह बैलगाड़ी का ज़माना था। दो बैलों की जोड़ी ही हल भी जोतती थी। अकेला बैल किस काम का ?
जिस प्रकार रंगी को नारंगी, मेवे को खोया, और चलती को गाड़ी कहना उलटबासी है, उसी तरह दो अलग अलग वस्तुओं के साथ को जोड़ी कहना भी उलटबासी ही हुआ। जोड़ा-जोड़ी हमारे सांकेतिक शब्द हैं। जोड़ी हमारी बनेगा कैसे जॉनी, और दो हंसों का जोड़ा, जोड़ के बेजोड़ उदाहरण हैं।।
बिना फेविकॉल के जो आपस में जुड़े रहते हैं, उन्हें आप जोड़ा अथवा जोड़ी कह सकते हैं। अंग्रेज़ी में pair शब्द सब कुछ बयां कर जाता है। वाह क्या जोड़ी है, दिलीप सायरा, धर्मेंद्र-हेमा, अमिताभ-जया और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की ! जब तक बीच में कोई दीवार नहीं खड़ी हुई, सलीम-जावेद की जोड़ी भी अनमोल थी।
मनुष्य, ईश्वर की एक बेजोड़ कलाकृति है। एक अकेले शरीर में कितनी जोड़ियां ? दो कान, दो दो आँख, दो पैर, दो हाथ, और तो और किडनी भी दो, लेकिन एक दिल और सौ अफ़साने। जब गब्बर बोलता है, ” ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर ” तो वह एक नहीं, दोनों हाथों की माँग करता है। बेटी के जब हाथ पीले होते हैं, तो दोनों एक साथ ही होते हैं। कान में जब झुमका पहना जाता है, तब दोनों कानों के लिए दो झुमकों की आवश्यकता होती है।।
एक चश्मा दोनों आँखों पर चढ़ जाता है। अंग्रेज़ी में चश्मे को pair of spects कहते हैं। एक ही आँख पर चश्मा नहीं चढ़ सकता। वैसे अगर नाक नहीं होती, तो चश्मे को सहारा कौन देता। चश्मा पहले नाक पर चढ़ता है, फिर आँख पर। यहाँ आप दोनों कानों की उपेक्षा भी नहीं कर सकते। हैं न सभी बेजोड़।
हम जूते खरीदने जाते हैं। शान से बैठकर, दुकानदार के सामने दोनों पाँव रख देते हैं। कोई अच्छा सा जूता बताओ। वह आपके पाँवों की जोड़ी के लिए एक अच्छे से जूते की जोड़ी लेकर आता है। दाहिने पाँव के लिए दाहिने पाँव का जूता और बाँये पाँव के लिए अलग जूता ! अंग्रेजी में foot, feet हो जाता है, और जूता, a pair of shoes। और आप एक जोड़ी जूते पसंद कर लेते हैं। अगर कहीं भीड़, या मेले में, मंदिर अथवा कथा-सत्संग में दो में से एक जूता- चप्पल गुम जाए, तो जोड़ी टूट जाती है। कोई भी दुकानदार एक चप्पल और जूता नहीं जुटा सकता। टूटे जूते की मरम्मत तो हो सकती है, लेकिन एक अकेले जूते की जोड़ी फिर से नहीं बन सकती।।
दो से एक होना ही द्वैत से अद्वैत होना है। जब दिल से दिल मिलता है, तो दो दिल एक जान हो जाते हैं। शायद भगवान ने इसीलिए एक दिल और एक ही जान भी दी। लोग जब दिल दे बैठते हैं, तो ज़िंदा नहीं रह सकते, इसीलिए जिसे दिल दिया है, उसे जान भी दे बैठते हैं। जब एक दिल, एक जान हो जाते हैं, और तब ज़माना कह उठता है, वाह ! क्या जोड़ी है।
पक्षी आदतन, अकेले नहीं रह सकते। चकवा-चकवी, चिड़ा-चिड़ी, तोता-मैना, मोर-मोरनी साथ जीते हैं, और साथ ही मरते हैं। वे दोनों मिलकर ही एक नीड का निर्माण करते हैं। संसार सृजन का दूजा नाम है। एक से एक का मिलना ही जोड़ी है। नाग-नागिन तो एक दूसरे का साथ पाताल तक नहीं छोड़ते, और एक शादी-शुदा जोड़ा, सात जनम तक।
हमारे आदर्श अवतार भी कहाँ अकेले हैं ? सीता-राम और राधा-कृष्ण को छोड़िए, विष्णु को लक्ष्मी और अजन्मे शंकर को भी पार्वती के साथ रहना ही पड़ा।
एक से एक मिलकर ही दो का अंक होता है। एक विषम है, और दो सम ! सम-विषम का जोड़ ही ज़िन्दगी का गणित है। लड़के-लड़की की पत्रिका में पहले गुण मिलाए जाते हैं, अवगुण नहीं। गुण मिलने पर ही जोड़ी जमती है। एक दूसरे के गुण-अवगुण
को समान रूप से स्वीकार करते हुए ज़िन्दगी की गाड़ी चलती है। गाड़ी भी तो आखिर दो ही से चलती है।।
दुनिया में कोई अकेला नहीं। जो अकेला है, वह भी किसी मक़सद, उद्देश्य और आदर्श
से जुड़ा है। सड़क का एक खंबा भी ज़मीन से जुड़ा है। एक विशालकाय वृक्ष की जड़ें भी तो ज़मीन से ही जुड़ी हैं।
हम कभी ईश्वर से बिछड़े थे। वह तो हम से आज भी जुड़ा हुआ है। योग का अर्थ भी जोड़ना ही है। हम अपने आदर्शों से जुड़े रहें, ईमान से बड़ा कोई धर्म नहीं।
सब में उसकी प्रतीति ही महायोग है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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