श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया…“।)
अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया
श्री प्रदीप शर्मा
हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।
हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।
आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।
इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।
देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।
सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।
अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।
कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।
नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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