श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “देश की मिट्टी…“।)
अभी अभी # ९५६ ⇒ आलेख – देश की मिट्टी
श्री प्रदीप शर्मा
हम जिसे देश, वतन, राष्ट्र, भारत माता अथवा धरती माता कहते हैं, वह वास्तव में हमारे देश की मिट्टी ही तो होती है, कहीं काली, कहीं रेतीली, तो कहीं पथरीली।
मिट्टी से ही बना यह शरीर, पंच तत्वों में विलीन हो, इसी मिट्टी में तो समा जाता है।
हम छोटे थे, तो मिट्टी में बहुत खेलते थे। मां हमें दूध पिलाती थी, खिलाती पिलाती थी, फिर भी हम मिट्टी खाते थे। कई बार मां ने मुंह में उंगली डाल मिट्टी बाहर निकाली होगी, हमें मारा भी होगा, लेकिन अपने देश की मिट्टी का स्वाद किस मां के लाल ने नहीं चखा।।
हमें क्यों अपना ननिहाल बार बार याद आता है, क्योंकि वहां मिट्टी में खेलने से कोई नहीं रोकता था। मिट्टी के मकान होते थे मिट्टी के ही आंगन और ओटले होते थे, जिन्हें गोबर से लीपा जाता था। रोज नया चूल्हा जलता था, बढ़िया लिपा पुता हुआ। वहां दूध डेयरी से नहीं आता था, गाय खुद दूध देती थी। तब दूध के दो ही तो नाम होते थे, मां का दूध और गाय का दूध। हां, लेकिन मक्खन तो नानी ही निकालती थी।
हमारा देश और कहीं नहीं है, आज भी हमारे आसपास ही है। एक किसान अगर खेती कर रहा है, अपने खेत की रखवाली कर रहा है, अनाज पैदा कर रहा है, तो वह देश की सेवा ही तो कर रहा है। यही उसकी राष्ट्रीयता है, उसकी देशभक्ति है। अपने देश की मिट्टी से जुड़े रहना ही सच्ची राष्ट्रीयता है।।
देश की इसी मिट्टी के लिए कई रणबांकुरों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है। ये माटी सभी की कहानी कहेगी। आप कभी हल्दी घाटी जाइए। महाराणा प्रताप का प्रताप देखिए, हम तो अपने घाव पर हल्दी लगाते हैं, योद्धाओं के लिए प्रकृति हल्दी घाटी बिछा देती है।
हम आज महानगरों के कांक्रीट जंगलों में आकर बस गए, मिट्टी के खिलौने भूल गए। जमीन बीघा एकड़ से सिमटकर स्क्वेयर फीट और इंच में आ गई। सर पर छत नहीं, पांवों के नीचे जमीं नहीं, 1, 2 और 3bhk में हमारी जिंदगी सिमटकर रह गई। इंसान कहां पहचाने मिट्टी और कहां खुला आसमान।।
ऐसे में, अचानक ही, मेरे अपने ही फ्लैट में हमारी बिटिया नर्सरी से दो नन्हे पौधे ले आई, मिट्टी में सने, पॉलीथीन से लिपटे। मुझे उनके लिए गमलों में मिट्टी तैयार करनी थी, और उन्हें सिर्फ गमलों में उतारना था।
जिन्हें बागवानी का और घर के पौधों की देखरेख का शौक है, वे वाकई देश की मिट्टी से ही जुड़े हैं। पौधों की सेवा भी किसी समाज सेवा अथवा ईश्वरीय सेवा से कम नहीं। नन्हीं खिलती कलियां और रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां बच्चों की मुस्कान और किलकारियों से कम नहीं होती।।
गमले की मिट्टी में भी मुझे अपने देश की ही मिट्टी नजर आती है। इसी बहाने मैं रोज अपने देश की मिट्टी से तो जुड़ा हुआ हूं। देश की मिट्टी की गंध मुझे अपने गमलों में आती है, वही मेरा तिरंगा है, वही मेरा वंदे मातरम् है। देश की मिट्टी की गंध के आगे सभी सौगंध फीकी है, क्योंकि हमने अपने देश की मिट्टी का स्वाद चखा है …!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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