डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ धरती की पुकार: क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचा पाएँगे? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी और आख़िरी मछली मर जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि पैसा खाया नहीं जा सकता।”

 

कुछ दिन पहले एक बच्चे ने अपने दादा से पूछा-

“दादाजी, क्या आपके बचपन में भी इतनी गर्मी पड़ती थी?”

दादा कुछ पल चुप रहे।

उन्होंने आँगन में खड़े पुराने नीम के पेड़ की ओर देखा और धीमे से कहा-

“नहीं बेटा, तब गर्मी भी इंसानों जैसी होती थी। आज की तरह गुस्से में नहीं।”

बच्चा उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया, लेकिन दादा समझ रहे थे कि सवाल मौसम का नहीं, बदलती हुई धरती का है।

 

सच तो यह है कि आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। कभी असमय बारिश, कभी भयंकर सूखा, कभी जंगलों में आग, कभी बाढ़ का कहर। ऐसा लगता है जैसे धरती हमें समझाना चाहती है कि उसके धैर्य की भी एक सीमा है।

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। बहुत से लोगों के लिए यह केवल एक तारीख है, लेकिन वास्तव में यह हमारी धरती के स्वास्थ्य की रिपोर्ट कार्ड जैसा दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं। हम केवल उसके मेहमान हैं।

दुर्भाग्य से आधुनिकता की दौड़ में हमने यह बात लगभग भुला दी है। हमने विकास के नाम पर जंगल काटे। नदियों को नालों में बदल दिया। मिट्टी को रसायनों से भर दिया और फिर आश्चर्य करते हैं कि मौसम इतना अस्थिर क्यों हो गया है।

कभी गाँवों में सुबह पक्षियों की आवाज़ से होती थी। आज अलार्म घड़ी की आवाज़ से होती है। पहले बच्चे पेड़ों की छाँव में खेलते थे। आज एयर-कंडीशनर वाले कमरों में मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ चलाते हैं। पहले बारिश आने से पहले मिट्टी की खुशबू पूरे गाँव को खुश कर देती थी। अब बारिश के साथ लोग ट्रैफिक जाम और जलभराव की चिंता करने लगते हैं।

बदलाव केवल पर्यावरण में नहीं आया है। बदलाव हमारे सोचने के तरीके में भी आया है। हमने प्रकृति को संसाधन समझ लिया, संबंध नहीं।

यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। लाखों जीव-जंतु अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं।

लेकिन इन सबके बीच एक उम्मीद भी है।

प्रकृति आज भी हमें रास्ता दिखा रही है।

एक जंगल हजारों एयर प्यूरीफायर से ज्यादा प्रभावी होता है। एक स्वस्थ नदी लाखों लीटर शुद्ध पानी दे सकती है। एक पेड़ केवल छाया नहीं देता, बल्कि कार्बन को सोखकर धरती का तापमान कम करने में मदद करता है। यानी प्रकृति कोई समस्या नहीं है। प्रकृति ही समाधान है।

लेकिन समाधान केवल सरकारों से नहीं आएगा। यह बदलाव हमारे घरों से शुरू होगा। जब हम बिना जरूरत बिजली बंद करेंगे। जब हम प्लास्टिक की थैली की जगह कपड़े का थैला इस्तेमाल करेंगे। जब हम पानी की एक-एक बूंद की कीमत समझेंगे। जब हम अपने बच्चों को पेड़ लगाने के साथ-साथ पेड़ बचाना भी सिखाएँगे।

 

अक्सर लोग कहते हैं-“मेरे अकेले के बदलने से क्या होगा?”

लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से शुरू हुआ है।

एक बूंद से नदी बनती है।

एक बीज से जंगल बनता है।

और एक जागरूक इंसान से समाज बदलता है।

 

मुझे हमेशा लगता है कि पर्यावरण संरक्षण का असली अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है।

असली पर्यावरण संरक्षण है-प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करना।

जिस दिन हम नदी को केवल पानी नहीं, जीवन समझने लगेंगे…

जिस दिन हम पेड़ को केवल लकड़ी नहीं, साँस समझने लगेंगे…

जिस दिन हम धरती को केवल जमीन नहीं, माँ समझने लगेंगे…

उस दिन किसी पर्यावरण दिवस की जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपने बच्चों के लिए बैंक बैलेंस छोड़ने की चिंता करते हैं, लेकिन उनके लिए स्वच्छ हवा, साफ पानी और सुरक्षित धरती छोड़ने की चिंता कम करते हैं।

याद रखिए, आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमारे पास कितनी संपत्ति थी। वे यह पूछेंगी कि हमने उनके लिए कैसी पृथ्वी छोड़ी।

फंडा यह है कि-

धरती हमारी विरासत नहीं है, यह हमारे बच्चों से लिया गया उधार है। यदि हम आज प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे तो कल प्रकृति हमारे अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाएगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted