कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “एक था बचपन …”।

? एक था बचपन … ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

एक था बचपन  प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन

 

दिल की गलियों में आज भी

चुपके से यादों के पखेरू उड़ते हैं

भीगी मिट्टी की सोंधी खुशबू

मन के आँगन को महकाती रहती है

 

ना कोई फ़िकर थी ना कोई परवाह

बस हँसी के अपने साथी होते थे

नर्म धूप भी उँगली पकड़े

रोज़ नए सपने बुन, इतराया करती थी…

 

एक था बचपन, प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन…

 

कागज़ की अपनी छोटी सी नाव,

बरसाती नालों में शान से बहती थी,

आँखों में रहती थी एक खुशनुमा दुनिया,

लिए रंग-बिरंगे सपने तमाम…

 

वो चिलचिलाती दोपहरें, वो भीगी रातें

अब भी दिल को छू जाती हैं

रूहानी यादों के साये आज भी,

वो दिलकश गीत गाया करते हैं

 

एक था बचपन प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे, लिए ढेरों अपनापन…

 

वो भी क्या दिन थे, मासूम यादगार पल

आज भी इक मुस्कान ले आते हैं

दिल के इस वीरान गुलशन में

यादों के ताज़े फूल खिल जाते हैं

 

एक था बचपन, प्यारा सा बचपन

क्या मस्ती भरे दिन थे लिए कितना अपनापन

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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