पूर्णिकाचार्य ‘कदम’ जबलपुरी
संक्षिप्त परिचय
(ई-अभिव्यक्ति में पं अंशुल विश्वंभर मिश्र “पूर्णिकाचार्य ‘कदम’ जबलपुरी” जी का हार्दिक स्वागत. आप विगत १४४५ दिनों से अनवरत पूर्णिका सृजन कर रहे हैं. वर्ष २०२४ में पूर्णिका संग्रह हेतु कादंबरी पुरस्कार सहित अनेकानेक संगठन में परामर्श पदाधिकारी, समीक्षक, ई-सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से अलंकृत विभूषित। अंतर राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आभा साहित्य संघ जबलपुर मप्र के महासचिव. इन संस्थाओं द्वारा २०२३ से सतत पूर्णिका उत्सव का सफल आयोजन कराया जा रहा है.
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – परिवर्तनी- ओं, स्थानीय – से आज फिर …!
☆ ॥ पूर्णिका ॥ – परिवर्तनीय➖ओं, स्थानीय➖से आज फिर ☆ पूर्णिकाचार्य ‘कदम’ जबलपुरी ☆
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प्रारम्भी नेह➖
ज़िन्दगी यूं चल रही है,हिम्मतों से आज फिर।।
अपने अपने होने वाले,फायदों से आज फिर।।
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आपकी झूठी सच्चाई ,का पता भी चल गया।
कौन भटका है दुबारा,मंजिलों से आज फिर।।नेह१
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सामने आना नहीं था , तो बताते पहले से।
गूंजती महफ़िल रही है,कहकशों से आज फिर।।नेह२
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हर तरफ है जाल मतलब,का दिखावा सब करें।
बच गया है वो अकेला , करतबों से आज फिर।।नेह३
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चालबाजी ये सियासत , की कोई जानें नहीं।
कौन करता बात सच की,घायलों से आज फिर।।नेह४
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हम बदलेंगे युग बदलेगा , की कहानी सुनते हैं।
सारे दफ्तर फिर भी चलते,कागज़ों से आज फिर।।नेह५
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हार जाना सिर झुकाए , ये अलग ही बात है।
जीतना भी सीख जाए,कोशिशों से आज फिर।।नेह६
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कोई हमको दे चुनौती , डरने वाले हम नहीं।
यूं बनाया राम मंदिर ,हौसलों से आज फिर।।नेह७
परचयी नेह➖
ज़िद हवाओं की रही है, आंधियों के साथ चल।
डर गया कोई ‘कदम’ है,जुल्मतों से आज फिर।।नेह८
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आपका आना हुआ जो,क्या बताएं हम अभी।—तजमीं
भर गया दामन हमारा , हसरतों से आज फिर।।— प्रदत्त सुधि
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© पूर्णिकाचार्य👣.’कदम’ जबलपुरी
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