श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०२ ☆
☆ अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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गौरी सुत प्रथमेश को, करिए नमन सुजान।
कृपा करें शुभ लाभ सह, रिद्धि-सिद्धि सम्मान।।
नमन पूज्य गणराज हैं, रिद्धि-सिद्धि के साथ।
लाभ सहित शुभ काज हों, मूषक वाहन नाथ।।
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गणेश जी का हमारे घर आना हर वर्ष किसी अपने के घर आने जैसा लगता है। गणेश चतुर्थी पर जब उन्हें सादगी से घर लाते हैं, तो स्वागत की तैयारी में बहुत कुछ नहीं चाहिए—दूर्वा, फूल, पान का पत्ता, धूप-दीप और घर के बने भोग से ही वातावरण में अपनापन उतर आता है। कुछ ही देर में लगता है, जैसे देवता के साथ घर का कोई अपना अतिथि आकर बैठ गया हो।
दस दिनों तक उनकी उपस्थिति घर की दिनचर्या में घुली रहती है। सुबह दर्शन, शाम की आरती और बीच-बीच में उनके सामने से गुजरते हुए अनायास ठहर जाना—सब सहज ही दिन का हिस्सा बन जाता है। आँगन की हरियाली भी जैसे इस संगत का हिस्सा बन जाती है। तुलसी, बेलें, गमलों में खिले फूल और पत्तियों के बीच से आती हवा—सब मिलकर उनके लिए अपना-सा परिवेश रच देते हैं।
फिर अनंत चौदस आती है।
विदाई की तैयारी करते हुए मन में एक अनकहा-सा खिंचाव होता है। जिनसे दस दिनों तक इतनी सहज निकटता रही, उन्हें अब विदा करना है। पर शायद यही जीवन का ढंग है—मिलना, साथ रहना और फिर अपने मूल की ओर लौट जाना।
हमारे यहाँ विसर्जन घर में ही होता है। स्वच्छ जल से भरे पात्र में गणेश जी को पूरे सम्मान के साथ धीरे-धीरे विदा करते हैं। पूजा की सामग्री में भी प्रकृति के जितना निकट रहा जा सके, उतना ही अच्छा लगता है। बाद में उस जल को घर के पेड़-पौधों में अर्पित कर देते हैं—कभी किसी पुराने पौधे की मिट्टी में, कभी किसी नए लगाए पौधे की जड़ों में। इस वर्ष विसर्जन के साथ कुछ नए पौधे लगाने का भी मन है। शायद यह संयोग नहीं कि गणपति की विदाई और किसी नए जीवन की शुरुआत एक ही दिन हो।
गणेश जी को विदा करने का यह ढंग किसी नियम से अधिक एक घरेलू अनुभूति है। जो हमारे घर आए, उसे प्रेम से स्थान दिया; जो लौटना है, उसे सहजता से लौटने दिया और जाते-जाते उसकी स्मृति को मिट्टी, जल और हरियाली में रहने दिया।
इसलिए अनंत चौदस के दिन जब गणेश जी जल में विलीन होते हैं, तो घर अचानक खाली नहीं लगता। पास ही कोई पत्ता हिल रहा होता है, कोई कली खिलने को होती है, किसी पौधे की मिट्टी में वही जल उतर रहा होता है।
तब मन चुपचाप पूछता है—
विदाई कहाँ हुई?
गणपति तो शायद रूप बदलकर यहीं रह गए।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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