श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०३ ☆

☆ आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय…

एक नीम, एक घर और स्मृतियों का संसार

रास्ते में चलते हुए कभी-कभी कोई दृश्य हमारी गति को धीमा कर देता है। दूर तक फैली हरियाली के बीच खिले कप के आकार जैसे पीले फूल, सड़क के दोनों ओर खड़े वृक्ष और कहीं अपनी जड़ों को धरती के ऊपर उतारते बरगद। प्रकृति के ऐसे दृश्य मन को किसी अनकही शांति से भर देते हैं। लगता है, सुकून की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं; वह हमारे आसपास ही बिखरा है। बस, उसे देखने के लिए मन का कुछ देर ठहरना जरूरी है।

ऐसे ही किसी रास्ते पर जब नीम दिखाई देता है, तो मेरी दृष्टि कुछ पल उसके साथ ठहर जाती है। उस क्षण मैं केवल सामने खड़े वृक्ष को नहीं देखती, मेरा मन अपने घर के आँगन तक पहुँच जाता है।

हमारा घर पुश्तैनी है। उसकी कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रही है। पिता ने अपने पिता से सुना था कि जब इस घर को लिया गया, तब भी आँगन के बीचोंबीच नीम का वृक्ष मौजूद था। घर के पास कभी एक तालाब हुआ करता था। समय के साथ आसपास का परिवेश बदला, घर में लोग आए और पीढ़ियाँ आगे बढ़ती रहीं, लेकिन नीम वहीं बना रहा। घर की संरचना भी कुछ इस तरह रही कि वह आँगन के केंद्र में अपना स्थान बनाए रख सका। मानो घर ने अपने विस्तार में इस वृक्ष के लिए जगह नहीं छोड़ी, बल्कि उसी को केंद्र मानकर अपना संसार रचा हो।

मेरे जन्म से पहले का यह नीम मेरे बचपन का सहज साथी रहा है। उसके होने को मैंने कभी किसी विशेष घटना की तरह नहीं देखा। वह घर में उतना ही स्वाभाविक था, जितनी सुबह आँगन में उतरती धूप। शायद आत्मीयता इसी तरह जन्म लेती है—बिना किसी घोषणा के, हमारे जीवन में चुपचाप जगह बनाती हुई।

आज जब कहीं रास्ते में नीम दिखाई देता है, तो उसकी पत्तियाँ जैसे मुझे अपनी ओर बुलाती हैं। मन में एक परिचित-सा भाव जागता है, जिसे किसी एक शब्द में व्यक्त करना कठिन है। क्या वह बचपन की स्मृति है, घर की गंध है या उस समय का आकर्षण, जो बीत जाने के बाद भी हमारे भीतर जीवित रहता है? शायद इन सबका मिला-जुला रूप है। इतना अवश्य जानती हूँ कि किसी अनजान रास्ते पर दिखाई देने वाला नीम भी मुझे मेरे अपने नीम तक पहुँचा देता है।

समय के साथ मनुष्य का जीवन बदलता है। घरों में रहने वाले लोग बदलते हैं, उनकी दिनचर्याएँ बदलती हैं और नई स्मृतियाँ पुरानी स्मृतियों की जगह बनाती हैं। लेकिन कुछ उपस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनका हमारे जीवन में होना ही एक स्थिरता देता है। हमारे घर का नीम मेरे लिए ऐसी ही उपस्थिति है। वह पीढ़ियों के बदलते जीवन के बीच अपनी जगह बनाए रहा। शायद इसी निरंतरता ने उसके साथ मेरे संबंध को इतना गहरा किया कि आज उसकी पत्तियों में भी घर की पुकार सुनाई देती है।

अब समझ में आता है कि कुछ वृक्ष केवल धरती में जड़ें नहीं जमाते, वे हमारे जीवन में भी अपनी जड़ें उतार देते हैं। हम उनसे जुड़ते कब हैं, इसका कोई निश्चित क्षण नहीं होता। एक दिन बस इतना महसूस होता है कि उनसे दूर होकर भी हम उनसे अलग नहीं हुए हैं।

मेरे लिए नीम का वृक्ष आँगन के बीचोंबीच खड़ा समय है — समय, जो पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ता रहा, लेकिन जिसकी छाया में मेरा बचपन आज भी कहीं सुरक्षित है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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